ट्रांसफर नीति सिर्फ कागज़ों में! जमीनी हकीकत में ‘सेटिंग-गेटिंग’ का खेल, सालों से जमे अधिकारी

रिपोर्ट – सुर्य प्रकाश तिवारी

 

उत्तर प्रदेश सरकार हर वर्ष बड़े जोर-शोर से स्थानांतरण नीति जारी करती है। नियमों में स्पष्ट प्रावधान होते हैं कि कोई भी अधिकारी या कर्मचारी एक जनपद में अधिकतम 3 वर्ष और एक मंडल में 7 वर्ष से अधिक नहीं रहेगा। लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आती है। कागजों पर सख्ती और पारदर्शिता की बात करने वाली यह नीति विभागों में लागू होती कहीं दिखाई नहीं देती।

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असल स्थिति यह है कि अधिकांश विभागों में वर्षों से जमे अधिकारी और कर्मचारी बिना किसी डर के एक ही स्थान पर टिके हुए हैं। ट्रांसफर सीजन आते ही कुछ दिखावटी तबादले जरूर होते हैं, लेकिन असली खेल पर्दे के पीछे चलता है—जहां ‘सेटिंग-गेटिंग’, सिफारिश और पैसों का बोलबाला रहता है। जिनका नेटवर्क मजबूत होता है, वे आराम से अपनी कुर्सी बचा लेते हैं, जबकि कमजोर या बिना पहुंच वाले कर्मचारियों का स्थानांतरण कर दिया जाता है।

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महाराजगंज जनपद इसका जीता-जागता उदाहरण है। यहां पीसीयू में अभिषेक यादव जैसे कर्मचारी लगभग 8 वर्षों से जमे हुए हैं,

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जबकि नीति के अनुसार उन्हें कई बार स्थानांतरित हो जाना चाहिए था। इसी तरह ग्राम पंचायत स्तर पर भी कई सेक्रेटरी वर्षों से एक ही ब्लॉक और जिले में कार्यरत हैं, जो नियमों की खुली अवहेलना है।

 

वन विभाग की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। निचलौल रेंज में रेंजर सुनील कुमार राव लगभग 5 वर्षों से तैनात हैं। जबकि ट्रांसफर नीति के अनुसार यह अवधि अधिकतम सीमा से कहीं ज्यादा है। इसके बावजूद न तो कोई कार्रवाई होती है और न ही जवाबदेही तय होती है।

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सबसे चिंताजनक बात यह है कि बड़े अधिकारी भी इस व्यवस्था का हिस्सा बने हुए हैं। कई उच्च पदों पर बैठे अधिकारी 3 वर्ष से अधिक समय से एक ही जनपद में जमे हुए हैं, जो सीधे तौर पर शासनादेश का उल्लंघन है। इसके बावजूद उनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती।

 

ट्रांसफर नीति में यह भी स्पष्ट है कि केवल 20 प्रतिशत तक ही स्थानांतरण किए जाएंगे और वह भी मेरिट के आधार पर, लेकिन वास्तविकता में यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होती। ऑनलाइन सिस्टम की बात जरूर की जाती है, लेकिन अंतिम निर्णय अक्सर बंद कमरों में ही तय होता है।

 

हर साल नई नीति जारी होती है, नई गाइडलाइन आती है, लेकिन लागू कुछ भी नहीं होता। नतीजा यह है कि ईमानदार और मेहनती कर्मचारियों का मनोबल गिरता है, जबकि ‘जुगाड़’ वाले कर्मचारी सिस्टम पर हावी हो जाते हैं।

 

अब सवाल यह है कि क्या ट्रांसफर नीति सिर्फ दिखावे के लिए है? क्या सरकार की मंशा के बावजूद विभागीय स्तर पर इसे जानबूझकर लागू नहीं किया जाता? अगर यही हाल रहा तो पारदर्शिता और सुशासन सिर्फ नारे बनकर रह जाएंगे।

 

जरूरत है सख्त निगरानी, जवाबदेही तय करने और नियमों का ईमानदारी से पालन कराने की—वरना हर साल की तरह इस बार भी ट्रांसफर नीति कागजों तक ही सीमित रह जाएगी।

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