रिपोर्ट -मनोज कुमार तिवारी

नई दिल्ली। पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूती देने वाले एक अहम फैसले में Supreme Court of India ने मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन की स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (SPE) को सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम से बाहर रखने वाली राज्य सरकार की अधिसूचना को रद्द कर दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एजेंसियों को “खुफिया एवं सुरक्षा संगठन” बताकर RTI से छूट नहीं दी जा सकती।
यह महत्वपूर्ण निर्णय न्यायमूर्ति J.K. Maheshwari और न्यायमूर्ति Atul S. Chandurkar की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत ने कहा कि RTI अधिनियम की धारा 24(4) के तहत केवल उन्हीं संस्थाओं को छूट मिल सकती है, जो वास्तव में खुफिया या सुरक्षा से जुड़े कार्य करती हैं। एसपीई का कार्यक्षेत्र केवल भ्रष्टाचार से संबंधित मामलों की जांच तक सीमित है, इसलिए उसे इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
क्या है पूरा मामला
यह मामला कटनी के तत्कालीन टाउन इंस्पेक्टर कमता प्रसाद मिश्रा से जुड़ा है, जिन्हें वर्ष 2017 में एसपीई द्वारा दर्ज एक ट्रैप केस में आरोपी बनाया गया था। वर्ष 2020 में अभियोजन स्वीकृति मिलने के बाद मिश्रा ने RTI के तहत उस स्वीकृति से संबंधित फाइलों, नोटिंग और पत्राचार की जानकारी मांगी थी।
हालांकि, संबंधित अधिकारियों और राज्य सूचना आयोग ने उनकी मांग को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि जानकारी देने से जांच और अभियोजन प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसके लिए RTI अधिनियम की धारा 8(1)(h) का हवाला दिया गया।
हाईकोर्ट का फैसला
मामला जब Madhya Pradesh High Court पहुंचा, तो अदालत ने मिश्रा के पक्ष में फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने कहा कि जांच पूरी हो चुकी है और आरोपपत्र भी दाखिल किया जा चुका है, इसलिए सूचना देने से किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं होगी। अदालत ने संबंधित विभाग को मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती और अंतिम फैसला
हाईकोर्ट के इस आदेश को एसपीई ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान एसपीई ने वर्ष 2011 की उस अधिसूचना का हवाला दिया, जिसके तहत उसे RTI से बाहर रखा गया था।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिसूचना को असंवैधानिक और कानून के विपरीत बताते हुए रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि—
> “एसपीई को RTI अधिनियम, 2005 की धारा 24(4) के उद्देश्य से खुफिया एवं सुरक्षा संगठन नहीं माना जा सकता।”
पीठ ने एसपीई की अपील खारिज करते हुए हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा और कमता प्रसाद मिश्रा को मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
SBIEO पर क्या कहा कोर्ट ने
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (SBIEO) के संबंध में अधिसूचना की वैधता पर कोई निर्णय नहीं दिया है। इसलिए फिलहाल उस संस्था पर अधिसूचना लागू बनी रहेगी।
फैसले का महत्व
यह निर्णय पारदर्शिता के क्षेत्र में एक मील का पत्थर माना जा रहा है। इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एजेंसियां भी जवाबदेही से बाहर नहीं रह सकतीं। RTI अधिनियम का उद्देश्य सरकारी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाना है, और इस फैसले से उस उद्देश्य को और मजबूती मिलेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय के बाद अन्य राज्यों में भी इसी तरह की अधिसूचनाओं को चुनौती मिल सकती है। साथ ही, यह फैसला आम नागरिकों को यह भरोसा देता है कि वे भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में सूचना पाने के अपने अधिकार का प्रभावी उपयोग कर सकते हैं।