सीमेंट-सरिया की फर्म से चाय–नाश्ता! सदर ब्लॉक में 88,997 रुपये के भुगतान ने खोली प्रशासनिक व्यवस्था की पोल

महराजगंज।
जनपद के सदर विकास खंड में क्षेत्र पंचायत निधि से किए गए एक भुगतान ने प्रशासनिक पारदर्शिता, वित्तीय अनुशासन और सरकारी नियमों की गंभीर अनदेखी को उजागर कर दिया है। प्रभारी खंड विकास अधिकारी एवं जिला विकास अधिकारी (डीडीओ) भोलानाथ कन्नौजिया द्वारा 17 दिसंबर को मेसर्स स्वतंत्र इंटरप्राइजेज नामक फर्म को 88,997 रुपये का भुगतान चाय-पानी, नाश्ता, कुर्सी, माइक और बैनर जैसे सेवा मदों में किया गया, जबकि यह फर्म सीमेंट, सरिया और बालू जैसी निर्माण सामग्री की आपूर्ति के लिए जीएसटी में पंजीकृत है।

हैरानी की बात यह है कि जिस फर्म को भुगतान किया गया है, उसके जीएसटी पंजीकरण में कैटरिंग, जलपान, टेंट या किसी भी प्रकार की सेवा प्रदाय का कोई उल्लेख नहीं है। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार, मेसर्स स्वतंत्र इंटरप्राइजेज को पोर्टलैंड सीमेंट, स्लैग सीमेंट, सुपर सल्फेट सीमेंट, लोहा एवं इस्पात की छड़ें, रॉड तथा प्राकृतिक रेत के व्यापार की अनुमति है। इसके बावजूद उसी फर्म से जलपान और अन्य सेवाओं के नाम पर भुगतान किया जाना कई सवाल खड़े करता है।

 

एक भुगतान, पांच तारीखें और कई सवाल

इस प्रकरण को और संदिग्ध बनाता है भुगतान का तरीका। 88,997 रुपये का भुगतान एकमुश्त किया गया, लेकिन इसके समर्थन में पांच अलग-अलग तिथियों के बाउचर अपलोड किए गए हैं।

29 मई 2025: 200 लोगों के सूक्ष्म जलपान के नाम पर 11,600 रुपये और कुर्सी-माइक के नाम पर 7,500 रुपये।

11 नवंबर 2025: 300 लोगों के जलपान के लिए 15,000 रुपये, चाय के लिए 3,000 रुपये और बैनर के लिए 1,500 रुपये।

20 नवंबर 2025: शौचालय मरम्मत के नाम पर 19,147 रुपये।

अन्य बाउचर: सूक्ष्म जलपान, बैनर, कुर्सी, चाय और कॉफी के नाम पर क्रमशः 17,300 रुपये और 13,950 रुपये।

इन सभी बाउचरों को जोड़कर एक ही भुगतान किया जाना वित्तीय नियमों की गंभीर अवहेलना की ओर इशारा करता है।

 

नियमों पर सवाल, जवाबदेही से दूरी

वित्तीय विशेषज्ञों और प्रशासनिक नियमों की जानकारी रखने वालों का कहना है कि जिस फर्म का पंजीकरण निर्माण सामग्री आपूर्ति का हो, उससे सेवा मदों में भुगतान करना नियमसंगत नहीं है। इसके लिए न केवल सेवा प्रदाय का पंजीकरण आवश्यक है, बल्कि अलग प्रक्रिया और अनुमोदन भी जरूरी होता है।

एक ही भुगतान में विभिन्न तिथियों के बाउचर जोड़ना इस आशंका को और मजबूत करता है कि व्यय को बाद में समायोजित कर वैध दिखाने का प्रयास किया गया। यह पूरा मामला क्षेत्र पंचायत निधि के दुरुपयोग और फर्जीवाड़े की ओर संकेत करता है।

 

हड़कंप, लेकिन खामोशी भी

मामला सामने आने के बाद ब्लॉक और जिला स्तर पर हलचल तेज हो गई है, लेकिन अब तक जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से कोई स्पष्ट बयान नहीं आया है। सवाल यह है कि

क्या जांच होगी?

जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी?

या यह मामला भी फाइलों में दबा दिया जाएगा?

सदर ब्लॉक का यह भुगतान प्रकरण प्रशासनिक कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है और यह तय करेगा कि सरकार की “जीरो टॉलरेंस” नीति जमीन पर कितनी कारगर है।

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