चेहरी ग्राम पंचायत में PMAY-G और मनरेगा कार्यों में भारी अनियमितता

 

17 लाख से अधिक की मजदूरी खर्च, फिर भी सैकड़ों आवास अधूरे — जिम्मेदार कौन?

रिपोर्ट: मनोज कुमार तिवारी -विशेष पड़ताल

महराजगंज जनपद के विकास खण्ड सदर अंतर्गत ग्राम पंचायत चेहरी में प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत कराए गए कार्यों को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। सामाजिक अंकेक्षण अवधि 01 अप्रेल 2024 से 31 मार्च 2025 के दौरान जारी FORMAT–2B (Works Expenditure – Wages and Material) के आंकड़े जहां लाखों रुपये के भुगतान को दर्शाते हैं, वहीं जमीनी सच्चाई इन आंकड़ों से मेल नहीं खाती।

 

दस्तावेजों के अनुसार इस अवधि में ग्राम पंचायत चेहरी में 17,27,256 रुपये की अकुशल मजदूरी, 16,84,256 रुपये की सामग्री लागत तथा 10,610 रुपये की कुशल मजदूरी का भुगतान दर्शाया गया है। इसके बावजूद पंचायत में PMAY-G के अंतर्गत स्वीकृत अधिकांश आवास आज भी अधूरे पड़े हैं। कई स्थानों पर केवल नींव या आधी दीवारें खड़ी हैं, जबकि कागजों में मकानों को फाउंडेशन, प्लिंथ, लिंटल और रूफ लेवल तक पूर्ण दिखाया गया है।

सूत्रों के अनुसार पंचायत में दर्जनों PMAY-G आवासों के नाम पर कई-कई किश्तों में मजदूरी भुगतान किया गया है। कुछ मामलों में लाभार्थियों के नाम से 75 मानव दिवस या उससे अधिक की मजदूरी दर्ज है, जबकि वास्तविक निर्माण कार्य बेहद धीमा या लगभग ठप है। ग्रामीणों का कहना है कि कागजों में “पूर्ण” दिख रहे मकान हकीकत में रहने लायक भी नहीं हैं।

स्थानीय ग्रामीणों और आवास लाभार्थियों ने आरोप लगाया है कि यह पूरा मामला रोजगार सेवक, ग्राम प्रधान और पंचायत सचिव की मिलीभगत से संचालित किया गया। लाभार्थियों का कहना है कि उनसे आवास की किश्त जारी कराने और निर्माण कार्य आगे बढ़ाने के नाम पर 20 हजार से 25 हजार रुपये प्रति आवास तक की अवैध वसूली की गई। जिन लोगों ने पैसा देने से इनकार किया, उनके आवास की अगली किश्त रोक दी गई या कार्य जानबूझकर अधूरा छोड़ दिया गया। नतीजतन कई गरीब परिवार आज भी अधूरे मकानों में या किराए के घरों में रहने को मजबूर हैं।

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FORMAT–2B में दर्ज कार्य कोड और PMAY-G पंजीकरण संख्याओं की सूची लंबी है। लगभग हर आवास पर 14–15 दिनों की कई किश्तों में मजदूरी भुगतान दिखाया गया है। इसके साथ ही पंचायत में चकबंद निर्माण जैसे अन्य मनरेगा कार्यों पर भी लाखों रुपये खर्च दर्शाए गए हैं। उदाहरण के तौर पर, विभिन्न चकबंद कार्यों में ढाई से तीन लाख रुपये तक की मजदूरी खर्च दिखाई गई है, जबकि ग्रामीणों का कहना है कि कई कार्य या तो नाममात्र के हुए हैं या उनकी गुणवत्ता बेहद खराब है।

सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब 17 लाख से अधिक की मजदूरी और लगभग उतनी ही राशि सामग्री मद में खर्च हो चुकी है, तो फिर आवास निर्माण पूर्ण क्यों नहीं हुए? क्या भुगतान से पहले भौतिक सत्यापन कराया गया? क्या जियो-टैगिंग, फोटो अपलोड और तीसरे पक्ष का निरीक्षण वास्तव में हुआ, या फिर यह सब केवल कागजी औपचारिकता तक सीमित रहा?

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ग्रामीणों ने मांग की है कि चेहरी ग्राम पंचायत में PMAY-G और मनरेगा के तहत कराए गए सभी कार्यों की उच्च स्तरीय, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराई जाए और जिन अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों की भूमिका संदिग्ध है, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो। साथ ही जिन लाभार्थियों से अवैध वसूली की गई है, उन्हें धनराशि वापस दिलाई जाए और अधूरे आवासों का निर्माण शीघ्र पूरा कराया जाए।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते प्रशासन ने इस पूरे प्रकरण पर ठोस कार्रवाई नहीं की, तो यह मामला केवल कागजी भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि गरीबों के अधिकारों और सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करेगा। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और संबंधित विभाग इन गंभीर आरोपों पर क्या ठोस कदम उठाते हैं।

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