रिपोर्ट -मनोज कुमार तिवारी

महराजगंज। मनरेगा में एनएमएमएस (NMMS) ऐप के जरिए फर्जी हाजिरी का मामला अब एक बड़े घोटाले का रूप लेता जा रहा है। “साइबर ठगो” द्वारा बनाए गए कथित क्लोन ऐप के जरिए मजदूरों की फर्जी उपस्थिति दर्ज कराने का खेल लंबे समय से चलता रहा, लेकिन प्रशासन की नींद तब टूटी जब शासन स्तर से 3 जून 2026 को सख्त निर्देश जारी हुए। इसके बाद 10 जून को उपायुक्त (श्रम रोजगार) महराजगंज द्वारा जारी पत्र ने पूरे मामले को और गरमा दिया है।

जिले के सभी 12 ब्लॉकों के खंड विकास अधिकारियों और कार्यक्रम अधिकारियों को निर्देशित किया गया है कि वे एनएमएमएस के माध्यम से दर्ज उपस्थिति की गहन जांच करें। मस्टररोल की पूरी अवधि के साथ-साथ उससे पहले और बाद की अपलोड तस्वीरों की भी समीक्षा करने को कहा गया है। साथ ही क्षेत्र भ्रमण को अनिवार्य बनाया गया है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह जांच वास्तव में दोषियों तक पहुंचेगी, या फिर यह केवल “डैमेज कंट्रोल” का प्रयास है?
स्थानीय स्तर पर चर्चाएं तेज हैं कि यदि जिले के जिम्मेदार अधिकारी पहले से सतर्क होते, तो यह क्लोन ऐप “महामारी” की तरह पूरे जनपद में नहीं फैलता। पखवाड़े तक फर्जी हाजिरी लगती रही, और सिस्टम आंख मूंदे रहा—क्या यह सिर्फ लापरवाही थी या मिलीभगत?

मीडिया में लगातार उजागर हो रहे मनरेगा घोटालों के बावजूद कार्रवाई का अभाव भी कई सवाल खड़े करता है। आरोप यह भी है कि कुछ जिम्मेदार अधिकारी ही भ्रष्टाचारियों को बचाने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। ऐसे में अब जब शासन सख्त हुआ है, तो स्थानीय स्तर पर अचानक सक्रियता को संदेह की नजर से देखा जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कागजी जांच या औपचारिक कार्रवाई से सच्चाई सामने नहीं आएगी। जरूरत है डिजिटल फॉरेंसिक जांच, बैंक ट्रांजैक्शन की पड़ताल और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका तय करने की।
अब देखना होगा कि यह जांच सिर्फ निचले स्तर तक सीमित रहती है या फिर बड़े अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होती है। फिलहाल, महराजगंज में NMMS क्लोन ऐप कांड प्रशासन की कार्यशैली और पारदर्शिता पर बड़ा सवाल बनकर खड़ा है। :::