ADJ कोर्ट संख्या-1 का बड़ा फैसला—दो वार्डों में नाम अंकित होने और गलत जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने पर चुनाव निरस्त
महराजगंज।
महराजगंज नगर पालिका परिषद के वार्ड संख्या 7 से पार्षद चुने गए महेन्द्र का चुनाव अब मान्य नहीं रहा। अपर जिला जज (ADJ) कोर्ट संख्या-1 के न्यायाधीश संजय मिश्र (UPID 6257) ने शुक्रवार 17 नवंबर 2025 को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए निर्वाचन याचिका संख्या 01/2023 को स्वीकार कर लिया और वार्ड-7 का चुनाव निरस्त कर दिया।
यह मामला पिछले दो वर्षों से लंबित था, जिसमें याचिकाकर्ता श्रवण (उम्र 42 वर्ष, निवासी – पड़री बुजुर्ग, वार्ड 7) ने कई गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए चुनाव को चुनौती दी थी।
✦ याचिका में लगाए गए मुख्य आरोप
याची श्रवण ने उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम, 1916 की धारा 20(5) के अंतर्गत दायर याचिका में निम्न आरोप लगाए थे—
1. उत्तरदाता महेन्द्र का नाम दो-दो वार्डों (7 व 24) की मतदाता सूची में दर्ज था, जो कानूनन प्रतिबंधित है।
2. महेन्द्र ने पिछड़ी जाति का गलत जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत कर नामांकन लिया, जबकि जिला स्क्रूटनी कमेटी पहले ही उसका प्रमाणपत्र निरस्त कर चुकी थी।
3. निर्वाचन अधिकारी ने याची द्वारा की गई आपत्ति का निस्तारण नहीं किया और “राजनीतिक दबाव में” नामांकन स्वीकार किया।
4. महेन्द्र ने वार्ड-7 की मतदाता सूची में अनर्ह और बाहरी लोगों के नाम जोड़वाए।
5. झूठे शपथपत्र और गलत जानकारी के आधार पर चुनाव लड़ना एक गंभीर कानूनी उल्लंघन है।
✦ न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
न्यायालय ने लंबी सुनवाई और साक्ष्य पर विचार करने के बाद कहा—
1. दो वार्डों की मतदाता सूची में नाम होना कानून का स्पष्ट उल्लंघन
ADJ ने कहा कि नगर निकाय अधिनियम की धारा 12E यह स्पष्ट कहती है—
> “कोई भी व्यक्ति एक से अधिक वार्डों की मतदाता सूची में नामांकित नहीं रह सकता।”
न्यायालय ने पाया कि महेन्द्र का नाम वार्ड-7 और वार्ड-24 दोनों में मौजूद था, और यह गलती चुनाव अधिकारी की गंभीर चूक है। इसलिए नामांकन अवैध था।
2. जाति प्रमाणपत्र निरस्त होने के बाद भी OBC बताकर नामांकन करना गंभीर अपराध
न्यायालय ने कहा—
> “जब जाति प्रमाणपत्र निरस्त हो चुका था, तब तक उसे पिछड़ी जाति का मान्य नहीं माना जा सकता।”
इस आधार पर महेन्द्र द्वारा प्रस्तुत OBC श्रेणी का शपथपत्र गलत और भ्रामक पाया गया।
3. गलत तथ्यों पर आधारित नामांकन से चुनाव दूषित
न्यायालय के अनुसार—
> “गलत मतदाता सूची और गलत शपथपत्र के आधार पर हुआ मतदान और उसका परिणाम विधि-विरुद्ध है।”
अतः चुनाव को रद्द करना आवश्यक था।
✦ क्या तर्क दिए गए महेन्द्र की ओर से?
उत्तरदाता महेन्द्र ने कहा कि—
“मेरा नाम गलती से दो सूचियों में आ गया, मैंने हटाने के लिए कहा था।”
“जाति प्रमाणपत्र का मामला राज्य स्तरीय समिति में विचाराधीन है।”
लेकिन न्यायालय ने इन तर्कों को अस्वीकार करते हुए कहा—
कोई प्रमाण नहीं कि नाम हटाने की अर्जी दी गई।
जब तक निरस्तीकरण रद्द न हो जाए, जाति प्रमाणपत्र मान्य नहीं।
✦ चुनाव परिणाम क्यों रद्द किया गया?
वाद बिंदु 1, 2 और 3—तीनों याची के पक्ष में प्रमाणित हुए।
न्यायालय ने कहा—
✔ महेन्द्र निर्वाचन हेतु अनर्ह था
✔ नामांकन मूल रूप से दूषित था
✔ परिणाम विधि-विरुद्ध था
इसलिए वार्ड-7 का पार्षद चुनाव निरस्त किया जाता है।
✦ अब आगे क्या होगा?
न्यायालय ने आदेश दिया—
चुनाव निरस्त करके उसकी प्रति जिलाधिकारी महराजगंज को भेजी जाए।
प्रशासन अब पुनर्निर्वाचन की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है।
✦ फैसला क्यों महत्वपूर्ण माना जा रहा है?
✔ यह निर्णय नगर निकाय चुनावों में पारदर्शिता और कानूनी अनुपालन की गंभीरता को दर्शाता है।
✔ गलत शपथपत्र, दोहरी मतदाता सूची और जाति प्रमाणपत्र की अनियमितताओं पर अदालत की कठोर रुख झलकता है।
✔ यह फैसला भविष्य में चुनाव अधिकारियों को सतर्क रहने का संदेश देता है।
वार्ड-7 से महेन्द्र की जीत अब निरस्त हो चुकी है। चुनाव प्रक्रिया में हुई अनियमितताओं, दोहरी मतदाता सूची और गलत जाति प्रमाणपत्र के आधार पर यह निर्णय नगर निकाय चुनाव इतिहास में एक मिसाल के रूप में दर्ज होगा।
यह मामला बताता है कि—
> “चुनाव लोकतंत्र की आत्मा है—और किसी भी स्तर पर अनियमितता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”