महाराजगंज मदरसा नियुक्ति विवाद: निचलौल मदरसे की नियुक्तियों पर गंभीर सवाल, अलग जांच की मांग तेज

महाराजगंज जनपद में मदरसा नियुक्तियों को लेकर सामने आई जांच रिपोर्टों ने प्रशासनिक व्यवस्था पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिले के विभिन्न मदरसा नियुक्ति मामलों में अनियमितताओं की पुष्टि होने और तत्कालीन अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी नीरज कुमार अग्रवाल की भूमिका संदिग्ध पाए जाने के बाद अब निचलौल बाजार स्थित मदरसा अरबिया जीजिया मजहरूल उलूम में वर्ष 2024 के दौरान की गई नियुक्तियों को लेकर भी गंभीर कानूनी प्रश्न उठने लगे हैं। हालांकि इस मदरसे के प्रकरण की अब तक विशेष जांच दल (SIT) द्वारा पृथक जांच नहीं कराई गई है, लेकिन अन्य मामलों में दोष सिद्ध होने के बाद स्वतंत्र जांच की मांग तेज हो गई है।

प्राप्त अभिलेखों के अनुसार, मदरसा अरबिया जीजिया मजहरूल उलूम की तत्कालीन प्रबंध समिति की वैधता 31 मार्च 2024 को समाप्त हो चुकी थी। इसके बावजूद समिति के सदस्य मुस्तफा के पुत्र बदरुल कादरी की भूमिका और प्रभाव को लेकर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं। नियमों के अनुसार किसी भी मान्यता प्राप्त और अनुदानित मदरसे में नियुक्ति की प्रक्रिया केवल वैध, पंजीकृत और विधिसम्मत प्रबंध समिति के माध्यम से ही की जा सकती है।

इसके विपरीत, 20 जून 2024 को मदरसा प्रबंधक आबिद अली द्वारा पांच व्यक्तियों को नियुक्ति पत्र जारी कर दिए गए और 22 जून 2024 को उन्हें कार्यभार भी ग्रहण करा दिया गया। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि मदरसे की नई कार्यकारिणी समिति का पंजीकरण 26 जून 2024 को कराया गया, यानी नियुक्तियों के समय कोई भी वैध और पंजीकृत प्रबंध समिति अस्तित्व में ही नहीं थी। इस स्थिति में की गई नियुक्तियां प्रथम दृष्टया नियमविरुद्ध और संदेहास्पद प्रतीत होती हैं।

मामले की गंभीरता यहीं समाप्त नहीं होती। अभिलेखों से यह भी सामने आया है कि मदरसा प्रबंध समिति से संबंधित विवाद एसडीएम निचलौल के न्यायालय में सोसाइटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम की धारा 25(1) के अंतर्गत लंबित था। विवाद लंबित रहने के बावजूद 30 मई 2025 को मदरसे को प्रशासनिक योजना का लाभ दिया जाना प्रशासनिक पारदर्शिता और निष्पक्षता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है। जानकारों का कहना है कि जब समिति ही विवादित हो, तब किसी भी प्रकार का वित्तीय या प्रशासनिक लाभ देना नियमों के प्रतिकूल है।

गौरतलब है कि जनपद के अन्य मदरसा नियुक्ति मामलों में जांच एजेंसियों द्वारा तत्कालीन अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी नीरज कुमार अग्रवाल के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 409 (आपराधिक न्यासभंग) और 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत एफआईआर दर्ज करने की सिफारिश की जा चुकी है। ऐसे में निचलौल मदरसे के प्रकरण को जांच से अलग रखना कई सवालों को जन्म देता है।

विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि यदि इस मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराई जाती है, तो न केवल नियुक्तियों की वास्तविकता सामने आएगी, बल्कि यह भी स्पष्ट होगा कि नियमों की अनदेखी जानबूझकर की गई या प्रशासनिक संरक्षण के तहत। जांच के दायरे में मदरसा प्रबंधक आबिद अली सहित संबंधित अधिकारियों की भूमिका भी आ सकती है। कुल मिलाकर, निचलौल मदरसा नियुक्ति प्रकरण की गहन जांच मदरसा प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

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