निचलौल में तैनात वर्तमान BDO पर गंभीर आरोप: परतावल ब्लॉक में करोड़ों का टेंडर घोटाला, जांच की उठी मांग

रिपोर्ट -मनोज कुमार तिवारी 

जनपद महराजगंज के विकास खण्ड परतावल में वर्ष 2024-25 के दौरा हुए टेंडर घोटाले का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। वर्तमान में निचलौल ब्लॉक का कार्यभार संभाल रहे खण्ड विकास अधिकारी (BDO) संतोष कुमार यादव पर आरोप है कि उन्होंने अपने पूर्व तैनाती स्थल परतावल में रहते हुए बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएं कीं। इस पूरे मामले की जांच की मांग सामाजिक कार्यकर्ता मनोज कुमार तिवारी द्वारा की गई है, जिसके बाद प्रशासनिक महकमे में हलचल मच गई है।

प्राप्त दस्तावेजों और वित्तीय आंकड़ों के अनुसार, परतावल ब्लॉक में टेंडर प्रक्रिया के दौरान नियमों की खुलेआम अनदेखी की गई। एक ही वित्तीय वर्ष में कुछ चुनिंदा फर्मों को करोड़ों रुपये का भुगतान किया गया, जिससे पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

आंकड़ों के अनुसार, “जय माता जी ईंट उद्योग” को लगभग 45,99,734 रुपये, “अवामी ईंट उद्योग” को 93,95,024 रुपये और सबसे अधिक “मॉ एंटरप्राइजेज” को करीब 2,95,70,509 रुपये का भुगतान किया गया। यह सभी भुगतान विभिन्न विकास कार्यों और सामग्री आपूर्ति के नाम पर किए गए हैं।

सबसे गंभीर बात यह सामने आई है कि वित्तीय नियमों के अनुसार यदि किसी एक फर्म को 10 लाख रुपये से अधिक का कार्य दिया जाता है, तो ई-टेंडरिंग प्रक्रिया अपनाना अनिवार्य होता है। लेकिन यहां इस नियम की पूरी तरह अनदेखी की गई। बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया के एक ही फर्म को बार-बार बड़े ठेके दिए गए, जो स्पष्ट रूप से नियमों का उल्लंघन है।

विशेष रूप से “मॉ एंटरप्राइजेज” को लेकर कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं। जांच में यह सामने आया है कि यह फर्म मुख्य रूप से वर्क कॉन्ट्रैक्ट और हैंडपंप मरम्मत कार्यों के लिए पंजीकृत है। इसके बावजूद इसे आरओ प्लांट, निर्माण सामग्री और अन्य कई प्रकार की सप्लाई के ठेके दिए गए। यह स्थिति नियमों के विपरीत है और इससे यह संकेत मिलता है कि कार्यों का आवंटन निर्धारित प्रक्रिया के तहत नहीं बल्कि मिलीभगत के आधार पर किया गया।

GST रिकॉर्ड के अनुसार यह एक प्रोपराइटरशिप फर्म है, जिसका संचालन सुनील पांडेय द्वारा किया जा रहा है। सीमित कार्यक्षेत्र वाली इस फर्म को इतने बड़े पैमाने पर विविध कार्य सौंपे जाना कई सवाल खड़े करता है।

इस पूरे मामले में तत्कालीन खण्ड विकास अधिकारी संतोष कुमार यादव

की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। आरोप है कि उनकी सहमति और संरक्षण में वर्षों से एक ही फर्म को लगातार लाभ पहुंचाया गया, जिससे प्रतिस्पर्धा खत्म हो गई और सरकारी धन के दुरुपयोग का रास्ता साफ हो गया।

हैरानी की बात यह भी है कि हर वर्ष जिला स्तर पर ऑडिट होने के बावजूद इतनी बड़ी अनियमितताओं पर कोई ठोस आपत्ति दर्ज नहीं की गई। इससे ऑडिट प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी प्रश्नचिह्न लग रहा है। स्थानीय लोगों का मानना है कि इसमें ऑडिट अधिकारियों की भूमिका भी संदिग्ध हो सकती है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं और क्षेत्रीय नागरिकों का कहना है कि यह केवल एक सामान्य अनियमितता नहीं बल्कि सुनियोजित तरीके से सरकारी धन के दुरुपयोग का मामला है। यदि इसकी निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए तो कई बड़े खुलासे सामने आ सकते हैं।

अब देखना यह होगा कि शासन-प्रशासन इस गंभीर मामले को कितना गंभीरता से लेता है। क्या दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह दबा दिया जाएगा। फिलहाल जनता की निगाहें प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हुई हैं और सभी को जांच के निष्पक्ष परिणाम का इंतजार है।

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