सुप्रीम कोर्ट में लंबित केस के बीच चीनी मिल की संपत्तियों की कथित बिक्री, जिम्मेदारी को लेकर उठे गंभीर सवाल

रिपोर्ट -मनोज कुमार तिवारी

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महराजगंज/नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों के विनिवेश से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले के सुप्रीम कोर्ट में लंबित होने के बावजूद संबंधित मिल परिसंपत्तियों में कथित हस्तक्षेप और बिक्री का मामला सामने आया है। राजीव कुमार मिश्रा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (डायरी संख्या 16452/2010) प्रकरण, जो वर्ष 2010 से सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है, अब एक बार फिर चर्चा में है।

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इस केस में उत्तर प्रदेश सरकार, भारत सरकार, प्रमुख सचिव (वित्त), प्रमुख सचिव (विकास), उत्तर प्रदेश राज्य चीनी निगम और डिस-इन्वेस्टमेंट कोर ग्रुप जैसे महत्वपूर्ण पक्षकार शामिल हैं। यह मामला 5 जुलाई 2016 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकार किया गया था और वर्तमान में अंतिम सुनवाई के चरण में लंबित है।

इसी बीच, संबंधित मिल से जुड़ी गतिविधियों में एक नया विवाद सामने आया है। स्थानीय स्तर पर राकेश चौधरी नामक व्यक्ति स्वयं को उक्त फैक्ट्री का जिम्मेदार बताते हुए मिल की परिसंपत्तियों को तोड़ने और बेचने का कार्य कर रहा है। आरोप है कि मिल परिसर में बने पुराने भवनों को गिराया जा रहा है, पेड़ों को काटा जा रहा है और लोहे व अन्य निर्माण सामग्री को बेचा जा रहा है।

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जब इस संबंध में मीडिया द्वारा राकेश चौधरी से बातचीत की गई, तो उन्होंने दावा किया कि मिल “क्रियाशील” है और भविष्य में यहां नई शुगर मिल तथा इथेनॉल प्लांट स्थापित किया जाएगा। हालांकि, जब उनसे इस संबंध में कोई आधिकारिक दस्तावेज, सरकारी अनुबंध या अनुमति पत्र प्रस्तुत करने को कहा गया, तो वे ऐसा करने में असफल रहे।

सूत्रों के अनुसार, उक्त व्यक्ति का कहना है कि सरकार से बातचीत चल रही है और जल्द ही आवश्यक अनुमतियां मिल जाएंगी। लेकिन फिलहाल इस दावे के समर्थन में कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या बिना किसी आधिकारिक स्वीकृति के मिल की परिसंपत्तियों को तोड़ा और बेचा जा सकता है?

विशेषज्ञों का मानना है कि जब मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हो, तब संबंधित संपत्तियों की स्थिति यथावत बनाए रखना आवश्यक होता है। किसी भी प्रकार का बदलाव या हस्तांतरण न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) की श्रेणी में आ सकता है।

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उधर, Zircon Sugar Solutions Private Limited जैसी कंपनियां, जिनका नाम इस मिल से जुड़े संदर्भों में सामने आता रहा है, उनकी वित्तीय स्थिति भी मजबूत नहीं दिखती। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कंपनी को लगातार नुकसान हो रहा है और उसकी व्यावसायिक गतिविधियां सीमित हैं। ऐसे में यदि कोई नई परियोजना स्थापित करने का दावा किया जा रहा है, तो उसकी विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते हैं।

स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि बिना अनुमति के मिल की संपत्तियों का नुकसान किया जा रहा है, तो यह न केवल सरकारी संपत्ति का दुरुपयोग है, बल्कि इससे क्षेत्र की आर्थिक संभावनाओं पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

प्रशासनिक अधिकारियों से अपेक्षा की जा रही है कि वे इस पूरे प्रकरण की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करें और यदि कोई अनियमितता पाई जाती है, तो संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करें।

कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट में लंबित इस संवेदनशील मामले के बीच मिल परिसंपत्तियों में हो रही गतिविधियां कई गंभीर प्रश्न खड़े कर रही हैं। अब देखना यह होगा कि प्रशासन और न्यायपालिका इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाते हैं और क्या क्षेत्रीय जनता को इसका उचित समाधान मिल पाता है।

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