महराजगंज में भ्रष्टाचार का खुला खेल — आदेश के बावजूद नहीं हटाया गया ‘बाहुबली’ लिपिक, अधिकारियों की मिलीभगत उजागर

रिपोर्ट -मनोज कुमार तिवारी 

उत्तर प्रदेश के महराजगंज जनपद में भ्रष्टाचार किस कदर संस्थागत रूप ले चुका है, इसका ज्वलंत उदाहरण वरिष्ठ लिपिक यशवंत सिंह का मामला बन गया है। वर्षों से अवैध रूप से “वाद पटल सहायक” का नेमप्लेट लगाकर कार्य कर रहे इस कर्मचारी पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप साबित होने के बावजूद, आज तक न तो उसे हटाया गया और न ही स्थानांतरण आदेश का पालन कराया गया। यह स्थिति सीधे-सीधे प्रशासनिक तंत्र की मिलीभगत और संरक्षण की पोल खोलती है।

शिकायतकर्ता द्वारा महानिदेशक, स्कूल शिक्षा को भेजे गए पत्र में साफ आरोप लगाया गया है कि यशवंत सिंह के खिलाफ की गई जांच में भ्रष्टाचार सिद्ध हो चुका है। सहायक शिक्षा निदेशक, सप्तम मंडल, गोरखपुर की रिपोर्ट एक वर्ष पूर्व ही शासन को सौंपी जा चुकी है, लेकिन उसके बाद भी कार्रवाई शून्य है। सवाल यह उठता है कि आखिर किसके दबाव में एक दोषी कर्मचारी को बचाया जा रहा है?

सबसे गंभीर पहलू यह है कि स्वयं महानिदेशक द्वारा स्थानांतरण का आदेश दिए जाने के बावजूद, सचिव बेसिक शिक्षा परिषद, प्रयागराज सुरेन्द्र तिवारी ने उसे लागू नहीं किया। यह मात्र लापरवाही नहीं बल्कि खुला अवमानना और संरक्षण का संकेत है। आरोप है कि पूर्व निदेशक बेसिक शिक्षा प्रताप सिंह बघेल और सचिव सुरेन्द्र तिवारी की मिलीभगत से यशवंत सिंह वर्षों से सुरक्षित बना हुआ है।

मामला यहीं नहीं रुकता। आरोप है कि जनपद के अशासकीय सहायता प्राप्त विद्यालयों में फर्जी अंकपत्रों के आधार पर नियुक्त शिक्षकों से प्रतिमाह मोटी वसूली की जाती रही और यह रकम उच्च अधिकारियों तक पहुंचाई जाती रही। इस संगठित भ्रष्ट तंत्र का प्रमुख कड़ी यशवंत सिंह को बताया जा रहा है, जो एक “कलेक्शन एजेंट” की भूमिका निभाता रहा।

और भी चौंकाने वाला आरोप यह है कि यशवंत सिंह ने न्यायालय को गुमराह कर अपनी बहन को बिना वैध नियुक्ति के वेतन भुगतान कराने की कोशिश की। जब शैक्षिक प्रमाणपत्र ही संदिग्ध थे, तब वेतन आदेश कैसे जारी हुआ? यह सीधा-सीधा न्यायिक प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ है।

सूत्रों के अनुसार, सचिव स्तर से दो बार कागजी आदेश जारी कर मामले को दबाने की कोशिश की गई। लेकिन जब मामला लोकायुक्त और शासन स्तर तक पहुंचा, तब आनन-फानन में स्थानांतरण का आदेश निकालकर खानापूर्ति की गई — जिसे आज तक लागू नहीं किया गया।

वर्तमान में लोकायुक्त स्तर पर जांच जारी है, साथ ही यशवंत सिंह और उनकी पत्नी की नियुक्तियों की भी जांच चल रही है। इसके बावजूद उनका पद पर बने रहना यह साबित करता है कि भ्रष्टाचार सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम में गहराई तक फैला हुआ है।

अब बड़ा सवाल यह है — क्या सरकार इस ‘संरक्षित भ्रष्टाचार’ पर कार्रवाई करने का साहस दिखाएगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबाकर खत्म कर दिया जाएगा

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