रिपोर्ट – सुर्य प्रकाश तिवारी
गोरखपुर जनपद में भूमि क्रय-विक्रय से जुड़ा एक बड़ा कथित घोटाला सामने आया है, जिसमें के०डी०एस० एसोसिएट्स के माध्यम से प्रो० श्रीमती निर्मला देवी पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आरोप है कि संस्था द्वारा लगभग 33 एकड़ कृषि भूमि को किसानों से खरीदकर अवैध रूप से प्लाटिंग कर बेचा गया, जिससे न केवल राजस्व की भारी क्षति हुई बल्कि सैकड़ों लोगों को ठगा भी गया।

शिकायतकर्ता मनोज कुमार तिवारी, जो स्वयं को सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्वतंत्र पत्रकार बताते हैं, ने जिलाधिकारी गोरखपुर से लेकर आयुक्त गोरखपुर मंडल और अंततः प्रदेश शासन तक इस मामले की शिकायत की है। उनके अनुसार, संस्था ने कृषि भूमि को आवासीय प्लॉट के रूप में बेचते हुए करीब 600 लोगों से लगभग 55 करोड़ रुपये की वसूली की, लेकिन आज तक किसी भी खरीदार को जमीन पर कब्जा नहीं दिया गया।

शिकायत में यह भी कहा गया है कि जिस भूमि पर प्लाटिंग की गई, उसके लिए न तो कोई ले-आउट स्वीकृत कराया गया और न ही गोरखपुर विकास प्राधिकरण को सूचित किया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि पूरी प्रक्रिया नियमों के विपरीत की गई। आरोप यह भी है कि इस कार्य में तत्कालीन राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत रही है।

एक अन्य गंभीर आरोप अनुसूचित जाति के किसानों की भूमि खरीद को लेकर है। शिकायतकर्ता का कहना है कि लगभग 70 प्रतिशत भूमि ऐसे किसानों से खरीदी गई, जिनकी भूमि के हस्तांतरण के लिए जिलाधिकारी की अनुमति आवश्यक थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इसके अलावा, कुछ भूमि को बाद में “ताल” घोषित कर दिया गया, जबकि उस पर पहले ही प्लाटिंग कर बिक्री की जा चुकी थी। इससे सरकारी भूमि के दुरुपयोग की आशंका भी जताई गई है।
हालांकि, इस पूरे मामले में बन्दोबस्त अधिकारी चकबन्दी, गोरखपुर द्वारा प्रस्तुत जांच रिपोर्ट ने कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को नजरअंदाज कर दिया। रिपोर्ट में केवल अभिलेखीय विवरण प्रस्तुत किया गया और अधिकांश गंभीर आरोपों को “चकबन्दी विभाग से असंबंधित” बताते हुए खारिज कर दिया गया। इससे शिकायतकर्ता ने जांच को अपूर्ण और औपचारिक करार दिया है।

मनोज तिवारी का कहना है कि यदि समय रहते निष्पक्ष और व्यापक जांच नहीं कराई गई, तो सैकड़ों निवेशकों का पैसा डूब सकता है और प्रशासन की निष्क्रियता पर भी सवाल उठेंगे। उन्होंने प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह/सतर्कता) को पत्र भेजकर खुली सतर्कता जांच की मांग की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला न केवल राजस्व हानि बल्कि संगठित धोखाधड़ी का भी बन सकता है। ऐसे मामलों में विकास प्राधिकरण, राजस्व विभाग और पंजीकरण विभाग की भूमिका की भी जांच आवश्यक हो जाती है।
फिलहाल, मामला शासन स्तर पर विचाराधीन है, लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या इस प्रकरण में निष्पक्ष जांच होती है या यह भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाता है।