रिपोर्ट -मनोज कुमार तिवारी

उत्तर प्रदेश के उत्तर–पूर्वी हिस्से में स्थित महराजगंज जिला का गठन 2 अक्टूबर 1989 को हुआ था। यह जिला पहले गोरखपुर जिला का हिस्सा था, जिसे प्रशासनिक सुविधा और क्षेत्रीय विकास को ध्यान में रखते हुए अलग कर नया जिला बनाया गया। नेपाल सीमा से सटे होने के कारण यह क्षेत्र रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है और इसे अक्सर “नेपाल का प्रवेश द्वार” भी कहा जाता है। यह जिला गोरखपुर मंडल के अंतर्गत आता है।

महराजगंज को जिला बनाने के पीछे कई जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की लंबी मेहनत और दूरदर्शी सोच रही। इस ऐतिहासिक प्रक्रिया में उस समय के सिसवा क्षेत्र के विधायक रहे शिवेंद्र सिंह का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन के उस दौर को याद करते हुए बताया कि जब यह पूरा क्षेत्र गोरखपुर जिले का हिस्सा हुआ करता था और प्रशासनिक सुविधाओं के लिए लोगों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी।

शनिवार को सिसवा विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत निचलौल नगर के हर्रेडीह मोहल्ले में रहने वाले वरिष्ठ कार्यकर्ता प्रेम बहादुर सिंह के आवास पर उनके स्वास्थ्य का हालचाल जानने पहुंचे शिवेंद्र सिंह ने उस समय के संघर्षों को याद किया। उन्होंने बताया कि महाराजगंज को जिला बनाने की मांग लंबे समय से चल रही थी और इसके लिए जनप्रतिनिधियों तथा प्रशासन के बीच लगातार संवाद और प्रयास किए गए।

शिवेंद्र सिंह ने बताया कि उस समय जिले के जिलाधिकारी के रूप में डॉ. ओमप्रकाश कार्यरत थे, जिनके द्वारा नए जिले के गठन का प्रस्ताव तैयार किया गया था। इसके अलावा तत्कालीन राजस्व मंत्री माता प्रसाद का भी महत्वपूर्ण सहयोग मिला, जिन्हें बाद में अरुणाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया। उस समय क्षेत्र के सांसद जितेंद्र सिंह सहित कई जनप्रतिनिधियों ने भी इस पहल का समर्थन किया।

उन्होंने बताया कि उस दौर में क्षेत्र की विधानसभा सीटों में पनियार, श्यामदेवरवा, सिसवा, सदर, लक्ष्मीपुर और फरेंदा प्रमुख थीं। श्यामदेवरवा से जनार्दन प्रसाद ओझा, सिसवा से स्वयं शिवेंद्र सिंह, सदर से राम लक्ष्मण प्रसाद, लक्ष्मीपुर (वर्तमान नौतनवा क्षेत्र) से वीरेंद्र शाही और फरेंदा से हर्षवर्धन सिंह विधायक के रूप में कार्य कर रहे थे। इन सभी के संयुक्त प्रयासों और शासन–प्रशासन के सहयोग से अंततः 2 अक्टूबर 1989 को महाराजगंज को नए जिले का दर्जा मिला।
शिवेंद्र सिंह ने कहा कि उस समय यह क्षेत्र अत्यंत पिछड़ा हुआ था। न तो पक्की सड़कें थीं और न ही विकास की पर्याप्त सुविधाएं। उन्होंने बताया कि उस दौर में विधायक निधि भी नाम मात्र की होती थी या कई बार उपलब्ध ही नहीं रहती थी। इसके बावजूद जनप्रतिनिधियों ने अपने प्रयासों से कच्ची सड़कों को भरवाने और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की शुरुआत की।
उन्होंने कहा कि आज जो पक्की सड़कें और विकास कार्य दिखाई दे रहे हैं, उनकी नींव उसी दौर में रखी गई थी। कई स्थानों पर पहले मिट्टी की सड़कें बनाई गईं, जिन पर बाद में खड़ंजा और फिर पिच सड़क का निर्माण हुआ। समय के साथ कई बार नए निर्माण हुए, जिससे शुरुआती विकास कार्य आज दिखाई नहीं देते, लेकिन वही उस समय के विकास की असली आधारशिला थे।
शिवेंद्र सिंह ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी उस दौर की कठिनाइयों और संघर्षों से परिचित नहीं है, इसलिए यह बताना जरूरी है कि महाराजगंज को जिले का स्वरूप दिलाने और क्षेत्र के विकास की शुरुआत करने में कितने प्रयास और संघर्ष लगे थे। उनके अनुसार आज जो विकसित स्वरूप नजर आता है, वह बीते वर्षों की निरंतर मेहनत और सामूहिक प्रयासों का परिणाम है।