रिपोर्ट -मनोज कुमार तिवारी

प्रयागराज। मदरसा प्रबंधन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा हस्तक्षेप करते हुए उपजिलाधिकारी (एसडीएम) द्वारा पारित आदेश को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रकरण में आगे बढ़ने से पहले उसकी मेंटेनेबिलिटी (सुनवाई योग्य होने की स्थिति) तय करना अनिवार्य है।

मामला कमेटी ऑफ मैनेजमेंट मदरसा अजीजिया बनाम उत्तर प्रदेश सरकार व अन्य से जुड़ा है, जिसमें याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि पूर्व में 12 फरवरी 2026 को हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि संबंधित प्राधिकारी पहले यह तय करे कि मामला सुनवाई योग्य है या नहीं, उसके बाद ही आगे की कार्यवाही की जाए। इसके बावजूद एसडीएम ने सीधे मामले में आदेश पारित कर दिया, जो न्यायिक निर्देशों की अवहेलना माना गया।

माननीय न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। कोर्ट ने पाया कि एसडीएम ने सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 की धारा 25(1) के तहत अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए पहले मेंटेनेबिलिटी के मुद्दे पर विचार नहीं किया, जबकि यह न्यायालय के पूर्व आदेश और स्थापित कानूनी सिद्धांतों के विरुद्ध है।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मेंटेनेबिलिटी का प्रश्न सीधे तौर पर प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र (जूरिस्डिक्शन) से जुड़ा होता है, इसलिए इसे प्रारंभिक स्तर पर ही तय किया जाना चाहिए। इस आधार पर 23 फरवरी 2026 को पारित एसडीएम का आदेश अवैध ठहराते हुए रद्द कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने संबंधित प्राधिकारी को निर्देश दिया है कि वह मामले की पुनः सुनवाई करे और 12 फरवरी 2026 के आदेश के अनुसार पहले मेंटेनेबिलिटी पर निर्णय ले। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि पूरी प्रक्रिया को यथाशीघ्र, अधिमानतः दो माह के भीतर पूरा किया जाए।
इस फैसले को मदरसा प्रबंधन से जुड़े विवादों में एक अहम नजीर के रूप में देखा जा रहा है, जिससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि न्यायिक प्रक्रिया में नियमों और पूर्व आदेशों का पालन अनिवार्य है।