महराजगंज में मदरसा शिक्षा माफिया का जाल: फर्जी नियुक्ति, धन उगाही और अधिकारियों की मिलीभगत का बड़ा खुलासा

 रिपोर्ट – मनोज कुमार तिवारी 

महराजगंज, कुशीनगर और गोरखपुर जनपदों में मदरसा शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बड़ा और गंभीर मामला सामने आया है, जिसमें कथित तौर पर सक्रिय एक संगठित “मदरसा शिक्षा माफिया गिरोह” द्वारा व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार, फर्जीवाड़ा और धन उगाही किए जाने के आरोप लगे हैं। शिकायतकर्ता द्वारा जिलाधिकारी को दिए गए प्रार्थना पत्र में इस पूरे नेटवर्क का विस्तार से उल्लेख करते हुए निष्पक्ष जांच और कठोर कार्रवाई की मांग की गई है।

आरोपों के अनुसार, जुल्फेकार अहमद सिद्दीकी, आबिद अली, अंजुम कादरी और मोहम्मद सेराज लारी जैसे व्यक्तियों का एक गिरोह वर्षों से मदरसों में अवैध तरीके से प्रबंध समितियों को हटाकर स्वयं कब्जा कर रहा है। यह गिरोह फर्जी दस्तावेजों के आधार पर अपने रिश्तेदारों और करीबी लोगों की नियुक्तियां कराकर सरकारी धन का दुरुपयोग कर रहा है। शिकायत में यह भी कहा गया है कि इन लोगों की पहुंच विभागीय अधिकारियों तक है, जिसके कारण जांच प्रक्रिया प्रभावित होती है और कार्रवाई एकतरफा की जाती है।

सबसे गंभीर आरोप यह है कि मदरसों में नियुक्ति के नाम पर बेरोजगार युवाओं से मोटी रकम वसूली जाती है। इतना ही नहीं, जो शिक्षक या कर्मचारी विरोध करते हैं, उन्हें निलंबन और निष्कासन की धमकी देकर डराया जाता है। कई मामलों में यह भी सामने आया है कि शिक्षक नियमित रूप से मदरसे में उपस्थित नहीं रहते, बल्कि सप्ताह में एक दिन आकर पूरी हफ्ते की उपस्थिति दर्ज कर देते हैं। बायोमेट्रिक मशीन में भी कथित रूप से कृत्रिम अंगुली निशान (Artificial Fingerprint) का उपयोग कर उपस्थिति दर्ज करने की बात कही गई है।

शिकायत में जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी और अन्य विभागीय कर्मचारियों पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि जब भी किसी मदरसे की शिकायत की जाती है, तो जांच से पहले ही संबंधित पक्ष को सूचित कर दिया जाता है, जिससे जांच के दौरान सभी व्यवस्थाएं “सही” दिखा दी जाती हैं और शिकायत को निराधार बताकर बंद कर दिया जाता है। सूचना का अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारी भी समय पर उपलब्ध नहीं कराई जाती, जिससे पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते हैं।

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मामले में यह भी उल्लेख किया गया है कि कई मदरसों की प्रबंध समितियों को लेकर विवाद न्यायालय में लंबित हैं, बावजूद इसके संबंधित अधिकारियों द्वारा एकल व्यवस्था लागू नहीं की जा रही है और विवादित व्यक्तियों से ही प्रशासनिक एवं वित्तीय कार्य कराए जा रहे हैं। यह स्थिति नियमों के विपरीत बताई गई है।

इसके अलावा, मदरसा विनियमावली 2016 के स्पष्ट प्रावधानों की अनदेखी करते हुए प्रबंध समिति के सदस्यों के रिश्तेदारों की नियुक्ति किए जाने का भी आरोप है। आरोप है कि इन नियुक्तियों को वैध दिखाने के लिए बाद में दस्तावेजों में हेरफेर (बैक डेटिंग) की जाती है।

पूरे प्रकरण में शिकायतकर्ता ने जिलाधिकारी से मांग की है कि इस संगठित गिरोह, संबंधित मदरसा प्रबंधकों और विभागीय अधिकारियों/कर्मचारियों की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार पर रोक लगाई जा सके।

यह मामला न केवल मदरसा शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो इसका सीधा असर शिक्षा की गुणवत्ता और समाज के भरोसे पर पड़ेगा।

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