रिपोर्ट -मनोज कुमार तिवारी

महराजगंज। आखिरकार वह दिन आ ही गया जब सहकारिता विभाग में वर्षों से जमे एक चर्चित अधिकारी की कुर्सी हिल गई। सहकारी निरीक्षक वर्ग-2/सहायक विकास अधिकारी (सहकारिता) अभिषेक यादव का महराजगंज से बांदा स्थानांतरण कर दिया गया है। विभाग ने इसे भले ही “जनहित” में लिया गया निर्णय बताया हो, लेकिन हकीकत इसके पीछे कहीं ज्यादा गहरी और चौंकाने वाली नजर आ रही है।

करीब 9 वर्षों तक एक ही जनपद में जमे रहने वाले इस अधिकारी के कार्यकाल को लेकर लगातार सवाल उठते रहे। सूत्र बताते हैं कि धान और गेहूं खरीद प्रणाली में बड़े पैमाने पर खेल खेला गया, जिसमें फर्जी खरीद, कागजी रिकॉर्ड में हेरफेर और कमीशनखोरी का पूरा नेटवर्क सक्रिय था। आरोप यहां तक हैं कि सरकारी खजाने को करोड़ों नहीं बल्कि अरबों रुपये का चूना लगाया गया।
इस पूरे मामले को तब तूल मिला जब समाजसेवी मनोज कुमार तिवारी ने लगातार शिकायतें कर मामले को उच्च स्तर तक पहुंचाया। शिकायतों में स्पष्ट तौर पर खरीद केंद्रों पर गड़बड़ियों, फर्जी भुगतान और अधिकारियों की मिलीभगत का जिक्र किया गया। इसके बाद मामला लोकायुक्त उत्तर प्रदेश तक पहुंचा, जहां इस प्रकरण की जांच प्रचलित बताई जा रही है।
सूत्रों की मानें तो यह सिर्फ एक तबादला नहीं, बल्कि एक बड़े “सिस्टम क्लीनअप” की शुरुआत हो सकती है। विभागीय गलियारों में चर्चा है कि जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, कई और बड़े नाम सामने आ सकते हैं, जिन्होंने इस पूरे खेल को संरक्षण दिया।
सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि क्या यह तबादला सिर्फ औपचारिक कार्रवाई है या वास्तव में दोषियों पर कड़ी कार्रवाई का रास्ता खुलेगा? क्योंकि अक्सर ऐसे मामलों में स्थानांतरण को ही अंतिम कार्रवाई मान लिया जाता है और असली जिम्मेदार बच निकलते हैं।
फिलहाल, आदेश जारी होने के साथ ही संबंधित अधिकारी को तत्काल कार्यमुक्त होकर नए जनपद में योगदान देने के निर्देश दिए गए हैं। लेकिन जनता और जागरूक वर्ग की नजरें अब लोकायुक्त की जांच पर टिकी हैं, जो इस पूरे खेल की असल सच्चाई को उजागर कर सकती है।
अगर जांच निष्पक्ष हुई, तो यह मामला प्रदेश के सबसे बड़े खाद्यान्न घोटालों में से एक साबित हो सकता है।