रिपोर्ट -मनोज कुमार तिवारी

उत्तर प्रदेश की राजनीति और ग्रामीण प्रशासन में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। राज्य सरकार ने एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए यह तय किया है कि आगामी पंचायत चुनाव होने तक ग्राम प्रधान ही प्रशासक के रूप में कार्य करेंगे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सहमति के बाद यह व्यवस्था लागू होने जा रही है, जो प्रदेश के पंचायती राज इतिहास में पहली बार देखने को मिल रही है।

दरअसल, प्रदेश की 57,694 ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो रहा है। सामान्यतः ऐसी स्थिति में सरकार किसी सरकारी अधिकारी—जैसे खंड विकास अधिकारी (BDO) या सहायक विकास अधिकारी (ADO)—को प्रशासक नियुक्त करती रही है। लेकिन इस बार सरकार ने परंपरा से हटकर चुने हुए ग्राम प्रधानों को ही प्रशासनिक जिम्मेदारी सौंपने का फैसला किया है।
क्या है नई व्यवस्था?


नई व्यवस्था के तहत पंचायत चुनाव होने तक ग्राम प्रधान “प्रशासक” के रूप में कार्य करेंगे। इसके लिए प्रशासनिक समिति का गठन किया जाएगा, जिसमें ग्राम प्रधान के साथ वार्ड सदस्य और पंचायत सहायक भी शामिल हो सकते हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गांवों में विकास कार्य और सरकारी योजनाएं बिना किसी बाधा के जारी रहें।
यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब पंचायत चुनाव की प्रक्रिया कई कारणों से विलंबित हो रही है। मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन अभी बाकी है और ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए आयोग के गठन की प्रक्रिया चल रही है। ऐसे में चुनाव 2027 के विधानसभा चुनाव के बाद ही होने की संभावना जताई जा रही है।
क्यों जरूरी पड़ी यह व्यवस्था?
इस बदलाव के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण हैं—
1. मतदाता सूची में देरी: पंचायत चुनाव के लिए आवश्यक मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन 10 जून तक प्रस्तावित है, जबकि वर्तमान पंचायतों का कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो रहा है।
2. ओबीसी आरक्षण का मुद्दा: पंचायत चुनाव में आरक्षण तय करने के लिए ओबीसी आयोग का गठन किया गया है, जिसकी रिपोर्ट आने में 3 से 6 महीने लग सकते हैं।
3. राजनीतिक और कानूनी पहलू: पंचायत चुनाव को विधानसभा चुनाव 2027 के बाद कराने पर विचार किया जा रहा है। यह मामला न्यायालय में भी विचाराधीन है।
इन परिस्थितियों में प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने के लिए सरकार ने यह नया मॉडल अपनाया है।
पहले क्या होता था?
इतिहास पर नजर डालें तो पहले पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने पर प्रशासनिक नियंत्रण अधिकारियों के हाथ में चला जाता था। उदाहरण के लिए, 2021 में कोविड-19 महामारी के कारण पंचायत चुनाव लगभग तीन महीने देर से हुए थे। उस दौरान BDO और ADO को प्रशासक नियुक्त किया गया था।
इसी तरह, वर्ष 2000 में भी पंचायत चुनाव में देरी होने पर अधिकारियों को ही प्रशासनिक जिम्मेदारी दी गई थी। लेकिन इस बार सरकार ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड की तर्ज पर चुने हुए प्रतिनिधियों को ही जिम्मेदारी सौंपने का निर्णय लिया है।
प्रधानों को जिम्मेदारी देने के फायदे
इस निर्णय के कई सकारात्मक पहलू भी सामने आ रहे हैं—
स्थानीय समझ: ग्राम प्रधान अपने क्षेत्र की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को बेहतर समझते हैं।
जनसंपर्क: ग्रामीणों के साथ उनका सीधा संपर्क होता है, जिससे समस्याओं का त्वरित समाधान संभव होता है।
विकास कार्यों में निरंतरता: योजनाएं बाधित नहीं होतीं और काम तेजी से आगे बढ़ता है।
प्रधान संघ के प्रतिनिधियों का भी मानना है कि बाहरी अधिकारियों के मुकाबले स्थानीय प्रतिनिधि अधिक प्रभावी ढंग से कार्य कर सकते हैं।
प्रशासक बनने पर क्या थीं समस्याएं?
पहले जब सरकारी अधिकारियों को प्रशासक बनाया जाता था, तब कई समस्याएं सामने आती थीं—
वित्तीय अनियमितता: 2021 में प्रशासकों द्वारा खर्च किए गए लगभग 4000 करोड़ रुपये का पूरा हिसाब नहीं मिल पाया था।
स्थानीय जुड़ाव की कमी: अधिकारी उस क्षेत्र के निवासी नहीं होते, जिससे सामाजिक संवेदनशीलता का अभाव रहता है।
जनहित कार्यों में कमी: जैसे गरीब परिवारों की सहायता, सामाजिक आयोजनों में सहयोग आदि कार्यों में कमी देखी गई।
क्या ब्लॉक और जिला स्तर पर भी लागू होगी व्यवस्था?
संकेत मिल रहे हैं कि जुलाई में जब ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष का कार्यकाल समाप्त होगा, तब वहां भी इसी प्रकार की प्रशासनिक समितियां बनाई जा सकती हैं। यानी ब्लॉक स्तर पर ब्लॉक प्रमुख और जिला स्तर पर जिला पंचायत अध्यक्ष को ही प्रशासनिक जिम्मेदारी दी जा सकती है।
पंचायतों की भूमिका और महत्व
पंचायती राज व्यवस्था भारत के लोकतंत्र की नींव मानी जाती है। ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत—तीनों स्तर पर जनप्रतिनिधि विकास योजनाओं को लागू करते हैं।
ग्राम प्रधान: गांव में सड़क, पानी, सफाई और सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन।
ब्लॉक प्रमुख: शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास योजनाओं की निगरानी।
जिला पंचायत अध्यक्ष: जिले स्तर पर विकास योजनाओं का निर्धारण और बजट प्रबंधन।
ऐसे में इन पदों की निरंतरता बनाए रखना प्रशासनिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उत्तर प्रदेश सरकार का यह निर्णय प्रशासनिक दृष्टि से एक प्रयोग भी है और आवश्यकता भी। जहां एक ओर यह लोकतांत्रिक भावना को मजबूत करता है, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक निरंतरता सुनिश्चित करता है। हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ग्राम प्रधान अपनी जिम्मेदारियों को कितनी पारदर्शिता और ईमानदारी से निभाते हैं।
यदि यह मॉडल सफल होता है, तो यह देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह व्यवस्था ग्रामीण विकास और प्रशासन को किस दिशा में ले जाती है।