बरवां राजा: जहाँ काग़ज़ों पर विकास और ज़मीन पर भ्रष्टाचार, जिला प्रशासन बना मूक दर्शक मामला पहुंचा लोकायुक्त

रिपोर्ट – मनोज कुमार तिवारी 

उत्तर प्रदेश में “भ्रष्टाचार पर ज़ीरो टॉलरेंस” के सरकारी दावों की सच्चाई अगर देखनी हो, तो जनपद महराजगंज के विकास खण्ड मिठौरा की ग्राम पंचायत बरवां राजा एक जीता-जागता उदाहरण है। यहाँ भ्रष्टाचार केवल हुआ नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक संरचना की छत्रछाया में फलता-फूलता रहा—और जब शिकायत हुई, तो जांच ही दम तोड़ गई।

बरवां राजा में ग्राम प्रधान, सचिव, रोजगार सेवक, लेखपाल से लेकर खण्ड विकास अधिकारी तक पर लगे आरोप मामूली नहीं हैं। यह मामला शासकीय धन की संगठित लूट, मनरेगा अधिनियम के खुले उल्लंघन और सरकारी भूमि पर अवैध कब्ज़े का है। लेकिन सबसे गंभीर सवाल यह है कि जिला स्तर पर सब जानते हुए भी कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

शिकायत के मुताबिक जिन फर्मों—एम/एस ओम साई ट्रेडर्स और करूणा कान्ट्रैक्टर सप्लायर—से ईंट, बालू, सरिया, कीटनाशक व अन्य सामग्री की आपूर्ति दिखाई गई, उनके पास ऐसी कई सामग्रियों को बेचने का कानूनी अधिकार ही नहीं था। फिर भी भुगतान हुआ। सवाल साफ है—
बिल पास किसने किए?
जांच किसने रोकी?

मनरेगा में तो घोटाले की परतें और मोटी हैं। जिन लोगों के नाम पर मजदूरी भुगतान दिखाया गया, वे मजदूर थे ही नहीं—
कोई विदेश में, कोई दूसरे प्रदेश में, कोई निजी ठेला चलाने वाला, तो कोई सरकारी अस्पताल में कार्यरत। फिर भी उनके खातों में मनरेगा और राज्य वित्त की धनराशि ट्रांसफर की गई।
मतलब साफ है—
फर्जी मजदूर, फर्जी हाजिरी, असली पैसा गायब।

एमएमएमएस ऐप पर रोज़ 18 मस्टर रोल और कुल 154 मजदूरों की हाजिरी दिखाई गई, लेकिन पोर्टल पर फोटो केवल 10–12 लोगों के—वह भी बार-बार। यह कोई तकनीकी गलती नहीं, बल्कि पूर्व नियोजित धोखाधड़ी है। इसके बावजूद ब्लॉक और जिला स्तर के अधिकारियों ने आँखें मूँद लीं।

इतना ही नहीं, ग्राम सभा की बंजर भूमि (गाटा संख्या 598 व 623) पर खुलेआम अवैध कब्ज़ा कर लिया गया। आरोप है कि इसमें ग्राम प्रधान और क्षेत्रीय लेखपाल की मिलीभगत रही। सवाल यह है कि
क्या लेखपाल को ज़मीन की जानकारी नहीं थी?
या फिर जानकारी के बदले चुप्पी खरीदी गई?

शिकायतकर्ता दयानन्द सिंह ने सभी विधिक प्रक्रियाएँ पूरी कीं, जिला स्तर पर शिकायतें दीं, दस्तावेज़ सौंपे—लेकिन हर बार भ्रष्टाचारियों को बचाने की कोशिश हुई। अंततः थक-हारकर लोकायुक्त का दरवाज़ा खटखटाया गया।

अब असली परीक्षा लोकायुक्त प्रशासन की है।
क्योंकि अगर इस मामले में भी जांच सिर्फ काग़ज़ों तक सीमित रही, तो यह साफ संदेश होगा कि उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार से लड़ाई सिर्फ भाषणों तक सीमित है।

बरवां राजा कोई अपवाद नहीं—
यह उस सिस्टम का आईना है,
जहाँ ईमानदार शिकायतकर्ता अकेला पड़ जाता है,
और भ्रष्टाचारियों की सबसे बड़ी ताक़त प्रशासनिक चुप्पी बन जाती है।

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