रिपोर्ट -मनोज कुमार तिवारी
आखिरकार वही हुआ, जो वर्षों से पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता रहा है। चाहे मामला बड़ा हो या छोटा, अक्सर “शांति भंग” की धाराओं में चालान कर पुलिस अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाती है। कोठी भर थाने के अंतर्गत छांगुर और अरुण पटेल के विवाद में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला, जहां स्थायी समाधान की जगह दोनों पक्षों को ही शांति भंग की धाराओं में चालान कर एसडीएम न्यायालय भेज दिया गया।

बताया जा रहा है कि छांगुर और अरुण पटेल के बीच चला आ रहा विवाद जस का तस बना हुआ है। पुलिस की इस कार्यवाही से न तो विवाद सुलझा और न ही किसी ठोस निष्कर्ष तक बात पहुंची। हां, यह जरूर हुआ कि विधायक के करीबी माने जाने वाले अरुण पटेल को कुछ समय के लिए पुलिस हिरासत में लिया गया और कोठी भर थाने में बैठाकर रखा गया। इसके बाद दोनों को न्यायालय भेजकर पुलिस ने मानो अपने दायित्व की इतिश्री कर ली।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह की कार्यवाही केवल कागजी कार्रवाई बनकर रह जाती है। पुलिस ने न तो विवाद की जड़ तक जाने की कोशिश की और न ही किसी पक्ष को वास्तविक राहत दी। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह कदम मामले को सुलझाने की दिशा में था या फिर आने वाले समय में संघर्ष को और बढ़ावा देगा।
इस पूरे घटनाक्रम पर छांगुर का कहना है कि यह न्याय नहीं है। उनका आरोप है कि पुलिस ने केवल अपना कोरम पूरा किया और चालान के जरिए मामला न्यायालय पर डालकर खुद किनारा कर लिया। छांगुर ने साफ कहा कि यह लड़ाई यहीं खत्म नहीं होगी, बल्कि आगे और मजबूती से लड़ी जाएगी।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या शांति भंग का यह चालान वास्तव में शांति स्थापित कर पाएगा, या फिर यह मामला भविष्य में और उलझेगा। पुलिस की भूमिका पर उठते ये सवाल प्रशासन और कानून व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय बनते जा रहे हैं।