8 वर्षों की जमी तैनाती, बदला गया तर्क और लोकायुक्त की आड़—आईजीआरएस आख्या में सवालों के घेरे में सहकारिता विभाग

रिपोर्ट -मनोज कुमार तिवारी 

आईजीआरएस शिकायत संख्या 40018726001357 पर सहायक आयुक्त एवं सहायक निबन्धक, सहकारिता महराजगंज द्वारा जिलाधिकारी को भेजी गई आख्या ने जहाँ एक ओर शिकायत को निस्तारित करने की संस्तुति की है, वहीं दूसरी ओर उसी आख्या में ऐसे विरोधाभासी तर्क सामने आए हैं, जो पूरे प्रकरण को और अधिक संदेहास्पद बना रहे हैं। शिकायतकर्ता श्री मनोज कुमार तिवारी द्वारा जिला प्रबन्धक पीसीयू/सचिव डीसीएफ श्री अभिषेक यादव पर स्थानांतरण नीति उल्लंघन और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए गए थे।

आख्या के प्रथम बिंदु में यह स्पष्ट किया गया है कि श्री अभिषेक यादव विगत लगभग 8 वर्षों से जनपद महराजगंज में निरंतर तैनात हैं, जबकि राज्य सरकार की स्थानांतरण नीति अधिकतम तीन वर्ष की अवधि निर्धारित करती है। जांच अधिकारी ने यह कहकर अपना दायित्व सीमित कर लिया कि सहायक विकास अधिकारी (सहकारिता) के स्थानांतरण का निर्णय आयुक्त एवं निबन्धक, सहकारिता, उत्तर प्रदेश, लखनऊ स्तर से लिया जाता है। यह कथन अपने आप में यह संकेत देता है कि इतने लंबे समय तक एक ही जनपद में जमे रहने के पीछे किसी न किसी स्तर से संरक्षण प्राप्त है, जिसकी जांच आवश्यक प्रतीत होती है।

दूसरे बिंदु में जांच अधिकारी ने यह स्वीकार किया कि जुलाई 2025 से श्री अभिषेक यादव के पास किसी भी विकास खंड का प्रभार नहीं है। जबकि शिकायतकर्ता का आरोप था कि उन्हें कई विकास खंडों का प्रभार देकर भी वे कभी क्षेत्रों में नहीं जाते थे। यह तथ्य इस ओर इशारा करता है कि समाजसेवियों और मीडिया द्वारा बार-बार मामला उठाए जाने के बाद ही ब्लॉकों का प्रभार हटाया गया, न कि स्वेच्छा से या प्रशासनिक पारदर्शिता के तहत।

तीसरे और सबसे गंभीर बिंदु में, फर्जी किसानों के नाम पर खरीद दिखाकर चुनिंदा लोगों के खातों में धन भेजने जैसे भ्रष्टाचार के आरोपों पर जांच अधिकारी ने यह कहकर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि मामला लोकायुक्त स्तर पर विचाराधीन है। यह रुख न केवल जिम्मेदारी से बचने का प्रतीक है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि विभागीय स्तर पर तथ्यों की गहराई से पड़ताल करने के बजाय मामला ऊपर टालने का प्रयास किया गया।

कुल मिलाकर, आईजीआरएस की यह आख्या न तो शिकायत के बिंदुओं का तार्किक खंडन करती है और न ही विभागीय जवाबदेही तय करती है। स्थानांतरण नीति के उल्लंघन, वर्षों तक जमी तैनाती, मीडिया दबाव में बदले गए प्रभार और लोकायुक्त जांच की आड़—ये सभी तथ्य इस प्रकरण को निक्षेपित करने के बजाय उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच की मांग करते हैं। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और शासन स्तर पर इस आख्या को अंतिम सत्य मानकर फाइल बंद की जाती है या फिर वास्तव में भ्रष्टाचार और संरक्षण की परतें खोली जाती हैं।

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