मदरसा अजीजिया में नियमों की अनदेखी का आरोप, फर्जी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति और नियुक्तियों की जांच की मांग, शासनादेश का गलत हवाला देकर बचाव का प्रयास

ब्यूरो महराजगंज – रविन्द्र मिश्र

महराजगंज/गोरखपुर।
जनपद महराजगंज के सिसवा क्षेत्र स्थित मदरसा अजीजिया इशातुल उलूम, मिरकिकारी टोला अजमत नगर एक बार फिर गंभीर विवादों में घिर गया है। मदरसा नियमावली 2016 के कथित उल्लंघन, सुनियोजित तरीके से शिक्षकों की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति और उसके बाद संदिग्ध नियुक्तियों को लेकर उच्च स्तरीय जांच की मांग उठी है। इस संबंध में सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्वतंत्र पत्रकार मनोज कुमार तिवारी ने गोरखपुर मंडल के आयुक्त को शिकायती पत्र भेजकर पूरे प्रकरण की गोपनीय और निष्पक्ष जांच कराए जाने की मांग की है।

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि मदरसा अजीजिया के प्रबंधक अंजुम कादरी, अध्यक्ष बिलाल अहमद, प्रधानाचार्य अताउद्दीन तथा तत्कालीन जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी की मिलीभगत से मदरसा नियमावली 2016 के प्रावधानों की खुली अवहेलना की गई। आरोप है कि लगभग डेढ़ वर्ष के भीतर चार शिक्षकों को तथाकथित रूप से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के लिए मजबूर किया गया, जबकि एक अन्य शिक्षक की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की प्रक्रिया अभी भी चल रही है। इसके बाद रिक्त पदों पर भारी धनराशि लेकर अपने चहेतों की नियुक्ति की गई, जिससे करोड़ों रुपये के भ्रष्टाचार की आशंका जताई गई है।

शिकायतकर्ता का कहना है कि यह पूरा मामला केवल प्रशासनिक अनियमितता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सरकारी धन, पेंशन दायित्व और सेवा नियमों से जुड़े गंभीर प्रश्न भी शामिल हैं। आरोप यह भी है कि जांच के दौरान जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी महराजगंज द्वारा 23 जुलाई 2014 के शासनादेश संख्या 1159/52-3-2014-सा (9)/14 का हवाला देकर पूरे मामले को वैध ठहराने का प्रयास किया जा रहा है, जबकि यह शासनादेश केवल राज्य सहायता प्राप्त अरबी-फारसी मदरसों के सेवानिवृत्त शिक्षकों एवं शिक्षणेत्तर कर्मचारियों की पेंशन को राजकीय कोषागार से भुगतान से संबंधित है, न कि नियुक्ति प्रक्रिया या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को मनमाने ढंग से लागू करने का अधिकार देता है।

 

विशेषज्ञों का मानना है कि मदरसा नियमावली 2016 के तहत स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति, नियुक्ति और रिक्त पदों की पूर्ति के लिए स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित है। यदि इन नियमों को दरकिनार कर दबाव या आर्थिक लेन-देन के आधार पर निर्णय लिए गए हैं, तो यह न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि दंडनीय अपराध की श्रेणी में भी आ सकता है।

शिकायतकर्ता ने आयुक्त से मांग की है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए एक स्वतंत्र, उच्च स्तरीय समिति गठित कर गोपनीय जांच कराई जाए, ताकि सच्चाई सामने आ सके और दोषियों के विरुद्ध कठोर विधिक कार्रवाई की जा सके। उनका कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला अन्य मदरसों के लिए भी गलत मिसाल बन सकता है और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होंगे।

अब सभी की निगाहें मंडलायुक्त के निर्णय पर टिकी हैं कि क्या इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच होगी या फिर शासनादेश की आड़ में गंभीर आरोपों को दबाने का प्रयास किया जाएगा।

error: Content is protected !!