भूमाफिया पर मेहरबान क्यों है प्रशासन? कप्तानगंज में अवैध कब्ज़े पर खामोशी, सवालों के घेरे में सरकारी तंत्र”

मनोज कुमार तिवारी 

नगर पंचायत कप्तानगंज, जनपद कुशीनगर में सार्वजनिक उपयोग की भूमि पर हुए कथित अवैध अतिक्रमण ने प्रशासनिक कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खेल मैदान और संरक्षित बस स्टेशन जैसी महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक संपत्तियों पर लगभग दो एकड़ भूमि पर अवैध कब्ज़े का आरोप है, जहां अस्पताल, दुकान, आवास और इंटरलॉकिंग ईंट प्लांट तक खड़े कर दिए गए हैं। इसके बावजूद न तो अतिक्रमण हटाने की ठोस कार्रवाई दिखती है और न ही जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई अनुशासनात्मक कदम।

स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा उपजिलाधिकारी से लेकर अधिशासी अधिकारी तक शिकायतें की गईं, शपथ-पत्र दिए गए, रजिस्टर्ड डाक से पत्राचार हुआ—फिर भी हर स्तर पर जिम्मेदारी टालने का खेल चलता रहा। कहीं “अधिकार क्षेत्र से बाहर” का बहाना, तो कहीं चुप्पी। सवाल यह है कि जब सार्वजनिक भूमि पर खुलेआम निर्माण हो रहा है, बिना नक्शा स्वीकृति के काम चल रहा है, तो नगर पंचायत और राजस्व विभाग की भूमिका क्या है?

प्रशासन की निष्क्रियता ने “सरकारी संरक्षण” और “सत्ता पक्ष के प्रभाव” की आशंकाओं को बल दिया है। यदि यही निर्माण किसी आम नागरिक ने किया होता, तो क्या कार्रवाई इतनी सुस्त रहती? भूमाफिया घोषित करने की कानूनी प्रक्रिया होते हुए भी उसका उपयोग क्यों नहीं किया जा रहा? क्या प्रभावशाली व्यक्तियों के मामलों में कानून के मानक बदल जाते हैं?

जनहित की भूमि पर कब्ज़ा केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि जनता के अधिकारों पर सीधा हमला है। खेल मैदान और बस स्टेशन जैसी सुविधाएं आम नागरिकों के लिए होती हैं, किसी निजी लाभ के लिए नहीं। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह निष्पक्षता से कानून लागू करे, अतिक्रमण हटाए और दोषियों पर कार्रवाई सुनिश्चित करे।

अब निगाहें उच्चाधिकारियों पर हैं—क्या वे मामले का संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई करेंगे, या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा? जनता जवाब चाहती है।

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