सत्ता का दबाव या कानून की जीत? डी०ए०वी० नारंग इंटर कॉलेज में अवैध आउटसोर्सिंग जॉइनिंग को लेकर बवाल, प्रधानाचार्य पर हरिजन एक्ट की धमकी

न्यूज़ रिपोर्ट – मनोज कुमार तिवारी

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महराजगंज जनपद के घुघली स्थित डी०ए०वी० नारंग इंटर कॉलेज एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गया है। मामला आउटसोर्सिंग कर्मचारी की कथित अवैध जॉइनिंग से जुड़ा है, जिसे लेकर प्रधानाचार्य पर न केवल प्रशासनिक दबाव बनाया जा रहा है, बल्कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कराने की खुली धमकी भी दी जा रही है। यह पूरा प्रकरण शिक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक निष्पक्षता और कानून के राज पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

जानकारी के अनुसार, प्रार्थी उमेश प्रसाद, जो कॉलेज के पूर्व प्रबंधक स्व० वेद प्रकाश नारंग के विधिक पैरोकार हैं, ने गोरखपुर मंडल आयुक्त को प्रेषित शिकायती पत्र में आरोप लगाया है कि राजा रतन सिंह इंटर कॉलेज, निचलौल में आउटसोर्सिंग के तहत नियुक्त एक कर्मचारी को विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से भ्रष्टाचारपूर्वक डी०ए०वी० नारंग इंटर कॉलेज में जबरन पदभार ग्रहण कराने का प्रयास किया जा रहा है। जबकि विद्यालय में वर्तमान में प्रबंध तंत्र कालातीत (समाप्त) है, ऐसी स्थिति में किसी भी नियुक्ति या जॉइनिंग का कोई वैधानिक आधार नहीं बनता।

शिकायत में यह भी उल्लेख है कि प्रधानाचार्य द्वारा बार-बार उच्चाधिकारियों से लिखित मार्गदर्शन मांगा गया, लेकिन स्पष्ट दिशा-निर्देश देने के बजाय फोन कॉल और अनौपचारिक माध्यमों से दबाव बनाया जा रहा है। आरोप है कि यदि जॉइनिंग नहीं कराई गई तो हरिजन एक्ट में फंसाने की धमकी दी जा रही है। इसे मानसिक उत्पीड़न और नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया गया है।

इस पूरे मामले में जिलाधिकारी महराजगंज की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। सूत्रों के अनुसार डीएम इस गंभीर प्रकरण में मूकदर्शक बने हुए हैं। वहीं स्थानीय विधायक पर भी सत्ता के दबाव में अवैध जॉइनिंग कराने या प्रधानाचार्य पर मुकदमा दर्ज कराने की कोशिश का आरोप लगाया जा रहा है। शिक्षा जगत में चर्चा है कि क्या सत्ता के प्रभाव में कानून को दरकिनार कर दिया जाएगा या फिर नियमों की जीत होगी।

उधर, डी०ए०वी० नारंग इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य द्वारा जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) महराजगंज से लिखित रूप में स्पष्टीकरण भी मांगा गया है। प्रधानाचार्य ने स्पष्ट किया है कि विद्यालय में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के आरक्षण की स्थिति स्पष्ट नहीं है और अनुसूचित वर्ग की कोई रिक्ति उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद बिना आरक्षण नियमों के पालन के जॉइनिंग कराना इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम 1921 का खुला उल्लंघन होगा।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि डीआईओएस कार्यालय द्वारा अब तक आरक्षण स्थिति पर कोई लिखित जवाब नहीं दिया गया है, बल्कि अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी जा रही है। फोन के माध्यम से लगातार दबाव बनाकर जॉइनिंग कराने की कोशिशें तेज़ हैं।

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या सत्ता और प्रशासन के दबाव में एक प्रधानाचार्य को नियमों की बलि देनी पड़ेगी, या फिर कानून, संविधान और शिक्षा अधिनियम की मर्यादा कायम रहेगी। यह मामला न सिर्फ एक कॉलेज का है, बल्कि पूरे प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है। इस संदर्भ में जब जिला विद्यालय निरीक्षक से बात क गई तो उनका कहना है कि जेडी का आदेश है जिसका अनुपालन कराया जा रहा है।

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