रिपोर्ट -मनोज कुमार तिवारी

महराजगंज जनपद की कई ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों के नाम पर सरकारी धन के दुरुपयोग का एक बड़ा और चौंकाने वाला मामला सामने आया है। उपलब्ध दस्तावेज़ों और भुगतान विवरणों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि विनय ट्रेडर्स के माध्यम से वर्ष 2022 से 2023 के बीच बड़ी संख्या में ग्राम सभाओं में हैंडपंप रिबोर, हैंडपंप मरम्मत, देसी नल मरम्मत, स्ट्रीट लाइट, स्वच्छता, प्रशासनिक मद, जेसीबी, ट्रैक्टर-ट्रॉली, ह्यूम पाइप, पंचायत भवन सामग्री जैसे कार्यों के नाम पर भारी भरकम भुगतान किया गया।

लेकिन जब इन कार्यों की जमीनी हकीकत की पड़ताल की गई, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। कई ग्राम पंचायतों में जिन कार्यों का पूरा भुगतान दर्शाया गया है, वे या तो पूरी तरह से हुए ही नहीं, या फिर नाममात्र किए गए। विशेष रूप से हैंडपंप रिबोर के मामलों में गंभीर गड़बड़ी उजागर हुई है।
रिबोर के नाम पर बड़ा खेल
दस्तावेज़ बताते हैं कि लगभग हर ग्राम पंचायत में 28 से 30 हजार रुपये प्रति हैंडपंप रिबोर का भुगतान किया गया है। लेकिन स्थानीय ग्रामीणों और मौके की जांच में यह सामने आया कि अधिकांश स्थानों पर रिबोर के नाम पर सिर्फ 40 से 50 फीट पाइप ही डाली गई, जबकि भुगतान पूरा रिबोर दर्शाकर किया गया। कई जगहों पर पुराने हैंडपंप को ही चालू दिखा दिया गया, जबकि न तो मानक के अनुसार बोरिंग हुई और न ही आवश्यक सामग्री का प्रयोग किया गया।
यह स्थिति शिकारपुर, शीतलपुर, सिरौली, ठूठीबारी, वकुलडीहा, कटका, बाली, चंदा, गेढ़हवा, किशुनपुर, लोढीया, मिश्रौलिया, पिपरा, गड़ौरा, , झरवलिया, बैठवलिया, बलहीखोर, बढै़पुरवा, भगवानपुर, भरवलिया सहित दर्जनों ग्राम पंचायतों में देखने को मिली।
स्ट्रीट लाइट और हार्डवेयर दुकान का संदिग्ध गठजोड़
रिपोर्ट में एक और गंभीर पहलू सामने आया है। सोहगी बरवां और ठूठीबारी ग्राम पंचायतों में स्ट्रीट लाइट के नाम पर लाखों रुपये का भुगतान दिखाया गया, लेकिन वास्तविकता यह है कि इन पंचायतों में स्ट्रीट लाइट या तो लगी ही नहीं, या फिर बहुत सीमित संख्या में, वह भी निम्न गुणवत्ता की।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि हार्डवेयर की दुकान से न केवल स्ट्रीट लाइट का भुगतान किया गया, बल्कि उसी दुकान से ट्रैक्टर-ट्रॉली, जेसीबी मशीन, प्रशासनिक मद और अन्य सामग्री की आपूर्ति भी दर्शा दी गई। सवाल यह उठता है कि एक साधारण हार्डवेयर दुकान कैसे भारी मशीनों और प्रशासनिक सेवाओं की आपूर्ति कर सकती है?
प्रशासनिक मद में मनमानी
कई ग्राम पंचायतों में बार-बार प्रशासनिक मद के नाम पर 5 हजार, 8 हजार, 10 हजार, 15 हजार और 30 हजार रुपये तक के भुगतान दर्ज हैं। इन भुगतानों का न तो कोई स्पष्ट कार्य विवरण है और न ही कोई ठोस प्रमाण। यह भुगतान संदेह को और गहरा करता है कि प्रशासनिक मद का इस्तेमाल खुलेआम धन निकालने के लिए किया गया।
जेसीबी और ट्रैक्टर-ट्रॉली का फर्जी उपयोग
दस्तावेज़ों में कई तारीखों पर जेसीबी मशीन और ट्रैक्टर-ट्रॉली के उपयोग का भुगतान दिखाया गया है। लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि उन तारीखों पर न तो कोई बड़ा निर्माण कार्य हुआ और न ही जेसीबी या ट्रैक्टर गांव में दिखाई दिए। यह स्पष्ट रूप से फर्जी बिलिंग और कागजी काम की ओर इशारा करता है।
स्वच्छता, शौचालय और पंचायत भवन सामग्री भी सवालों के घेरे में
स्वच्छता अभियान, शौचालय निर्माण और पंचायत भवन सामग्री के नाम पर भी लाखों रुपये का भुगतान किया गया है। कई ग्राम पंचायतों में न तो नए शौचालय बने और न ही स्वच्छता से जुड़ा कोई ठोस कार्य दिखाई दिया। पंचायत भवन सामग्री के नाम पर भुगतान तो हुआ, लेकिन भवन में कोई नई सामग्री नजर नहीं आई।
जिम्मेदार कौन?
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कार्य धरातल पर नहीं हुए, तो भुगतान कैसे और किसके आदेश से किया गया?
क्या बिना भौतिक सत्यापन के भुगतान पास किए गए?
क्या तकनीकी सहायक, सचिव और जिम्मेदार अधिकारियों ने आंखें मूंद लीं?
या फिर यह सब एक सुनियोजित गठजोड़ का हिस्सा है?
जांच की मांग
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए।
सभी रिबोर कार्यों का भौतिक सत्यापन हो
स्ट्रीट लाइट और मशीनरी की मौके पर जांच की जाए
फर्जी भुगतान करने वालों से रिकवरी की जाए
दोषी अधिकारियों और संबंधित फर्म पर कड़ी कार्रवाई हो
विनय ट्रेडर्स के नाम पर हुए इन भुगतानों की सूची केवल आंकड़े नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल है। यदि समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो “हर घर नल”, “स्वच्छता मिशन” और “ग्रामीण विकास” जैसे योजनाएं सिर्फ काग़ज़ों तक सिमट कर रह जाएंगी। अब देखना यह है कि प्रशासन इस गंभीर खुलासे पर क्या कदम उठाता है, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।