NMMS ऐप में हाज़िरी, ज़मीन पर सन्नाटा: निचलौल के डोमा ग्राम पंचायत में मनरेगा कार्यों पर सवाल

महराजगंज।
निचलौल विकास खंड की ग्राम पंचायत डोमा में मनरेगा कार्यों की वास्तविकता और सरकारी रिकॉर्ड के बीच बड़ा अंतर सामने आया है। NMMS ऐप (नेशनल मोबाइल मॉनिटरिंग सिस्टम) के माध्यम से दर्ज की गई दैनिक उपस्थिति रिपोर्ट में जहां लगातार मजदूरों की उपस्थिति दिखाई जा रही है, वहीं स्थानीय हालात और समय-सारिणी कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

NMMS ऐप के अनुसार ग्राम पंचायत डोमा में एक ही प्रकार के कार्य को अलग-अलग मस्टर रोल नंबर (9953 से 9972 तक) पर दर्ज किया गया है, जिनमें अधिकांश दिनों में 10-10 मानव दिवस (Persondays) सृजित दिखाए गए हैं। हैरानी की बात यह है कि एक ही कार्य को बार-बार अलग मस्टर पर दिखाकर नियमित उपस्थिति दर्शाई गई, जबकि मौके पर कार्य की प्रगति नगण्य बताई जा रही है।

पहले कार्य के विवरण में यह सामने आता है कि 23 दिसंबर 2025 को रात्रि 00:56 बजे फोटो ली गई, जबकि फोटो दोपहर 14:45 बजे अपलोड की गई। कार्यस्थल की तस्वीरें मेट मंजू देवी द्वारा अपलोड की गईं, जिनमें जियो-लोकेशन अंकित है, लेकिन सवाल यह है कि रात के समय कार्यस्थल पर समूह फोटो लेना कितना व्यवहारिक और वास्तविक है?

दूसरे कार्य में भी यही स्थिति देखने को मिलती है, जहां समूह फोटो, उपस्थिति और जॉब कार्ड धारकों की सूची तो दर्ज है, लेकिन स्थलीय सत्यापन करने पर कार्य की निरंतरता और गुणवत्ता संदिग्ध प्रतीत होती है। सूची में दर्ज कई नामों के बारे में ग्रामीणों का दावा है कि वे उस दिन मौके पर मौजूद ही नहीं थे।

मनरेगा का उद्देश्य ग्रामीणों को रोजगार के साथ-साथ टिकाऊ परिसंपत्तियों का निर्माण करना है, लेकिन डोमा ग्राम पंचायत में डिजिटल हाज़िरी के सहारे कागजी काम पूरा कर भुगतान निकालने का आरोप लग रहा है। NMMS ऐप को पारदर्शिता का माध्यम बताया गया था, परंतु यदि इसी ऐप में समय, उपस्थिति और फोटो अपलोडिंग में हेराफेरी हो, तो पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि

NMMS ऐप में दर्ज दोनों कार्यों की भौतिक जांच कराई जाए,

फोटो अपलोड के समय और वास्तविक कार्य समय का डिजिटल ऑडिट हो,

मेट, ग्राम रोजगार सेवक और पंचायत स्तर के अधिकारियों की भूमिका की जांच की जाए,

और दोषी पाए जाने पर रिकवरी व एफआईआर की कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

अब देखना यह है कि प्रशासन इस डिजिटल सबूत को कितनी गंभीरता से लेता है, या फिर मनरेगा में “ऑनलाइन हाज़िरी, ऑफलाइन काम” का यह खेल यूँ ही चलता रहेगा।

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