निचलौल में 64 साल पुरानी विवादित जमीन पर अचानक कब्जे की कार्रवाई — बिना आदेश पुलिस-लेखपाल की दबंगई से ग्रामसभा में हड़कंप

महाराजगंज जनपद के निचलौल तहसील क्षेत्र के ग्रामसभा परगपुर में 64 वर्ष से चल रहा भूमि विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। ग्रामीणों के अनुसार न कोई नया आदेश, न कोई न्यायालयीन फरमान, इसके बावजूद निचलौल थाने की पुलिस, तहसील के लेखपाल अनिल कुशवाहा, कानूनगो राजेश सिंह सहित दलबल लेकर अचानक गांव पहुंच गई और विवादित भूमि पर कब्जा देने की कोशिश की।
इस अप्रत्याशित कार्रवाई से पूरे गांव में तनाव और रोष फैल गया।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस जमीन को लेकर सक्षम न्यायालय – आयुक्त, गोरखपुर मंडल – ने अपने आदेश दिनांक 19.02.2021 में स्पष्ट कहा है कि:

> “चकबंदी न्यायालय में लंबित वाद का अंतिम निर्णय ही दोनों पक्षों पर बाध्यकारी होगा। तब तक मृतका लालदेई के खाते पर प०क०-11 के आधार पर दर्ज वारिसों का नाम यथावत रखा जाना उचित है।”

 

यानि कि जब तक चकबंदी न्यायालय अंतिम फैसला नहीं सुना देता, तब तक कोई भी राजस्व या पुलिस अधिकारी इस भूमि पर न तो कब्जा दे सकता है और न ही नाम परिवर्तन कर सकता है।

इतना ही नहीं, संबंधित मामले में दूसरा आदेश (वाद संख्या 1011/2017) भी यही पुष्टि करता है कि:

मृतक राजेन्द्र की जमीन पर उनकी विधवा लालदेई का नाम प०क०-11 के तहत 1991 में दर्ज हुआ।

इस प्रविष्टि को सहायक कलेक्टर प्रथम श्रेणी के आदेश 15.05.1972 में विधिवत मान्यता मिली थी।

इस आदेश को आज तक किसी न्यायालय ने निरस्त नहीं किया है।

इसलिए इस मामले में हस्तक्षेप का अधिकार केवल चकबंदी न्यायालय को है।


स्पष्ट है कि इतने ठोस आदेशों के बावजूद स्थानीय पुलिस और राजस्व कर्मियों का मौके पर जाकर कब्जा देने का प्रयास न्यायिक आदेशों की अवहेलना और ग्रामीणों को परेशान करने जैसा प्रतीत होता है।

ग्रामीणों व मृतका लालदेई के वंशजों का आरोप है कि यह कार्रवाई पूरी तरह पक्षपातपूर्ण है और इसका उद्देश्य उन्हें डराकर जमीन खाली कराना है, जबकि न्यायालय ने स्पष्ट रूप से यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया है।

घटना के बाद ग्रामीणों ने जिलाधिकारी से पूरे प्रकरण की जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है। मामला गर्म हो चुका है और प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका पर प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है।

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