रिपोर्ट -मनोज कुमार तिवारी

महराजगंज जनपद में सोशल ऑडिट प्रक्रिया को लेकर बड़ा खुलासा सामने आया है, जहां ब्लॉक सोशल ऑडिट कोऑर्डिनेटर रेनू सिंह पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप जांच में सही पाए गए हैं। जिला प्रशासन की जांच रिपोर्ट ने पूरे मामले की परतें खोल दी हैं, जिसके बाद उन्हें कार्य से विरत कर दिया गया है।
जिला विकास अधिकारी, महराजगंज के निर्देश पर गठित जांच टीम ने विभिन्न ग्राम पंचायतों में स्थलीय निरीक्षण और संबंधित पक्षों के बयान दर्ज किए। जांच की शुरुआत ग्राम पंचायत सेमरा महराज (विकास खंड फरेंदा) से हुई, जहां वायरल वीडियो में रेनू सिंह द्वारा ग्राम प्रधान के पति विनोद सिंह से अवैध धन की मांग का मामला सामने आया था। विनोद सिंह ने अपने लिखित बयान में पुष्टि की कि वीडियो में बातचीत उन्हीं के साथ हुई थी और यह आरोप सत्य है। इस बयान पर कई गवाहों ने भी हस्ताक्षर किए।

जांच के दौरान ग्राम पंचायत डडवार बुजुर्ग में कराए गए कार्यों का निरीक्षण किया गया, जहां सीसी रोड कार्य स्थल पर सूचना बोर्ड (CIB) मौजूद पाया गया। हालांकि, रेनू सिंह द्वारा तैयार ड्राफ्ट रिपोर्ट में यह दर्ज किया गया था कि मौके पर कोई साइनबोर्ड नहीं था। यह तथ्य जांच में गलत साबित हुआ। इससे स्पष्ट हुआ कि रिपोर्ट में जानबूझकर गलत जानकारी दर्ज की गई थी।
इसी तरह ग्राम पंचायत कम्हरिया खुर्द में भी गंभीर अनियमितताएं सामने आईं। ग्राम रोजगार सेवक और ग्राम प्रधान ने लिखित बयान में आरोप लगाया कि रेनू सिंह ने ऑडिट के नाम पर धन की मांग की थी। रोजगार सेवक ने बताया कि उनसे 7000 रुपये मांगे गए, जिसमें से 3000 रुपये दिए भी गए।
विकास खंड निचलौल की कई ग्राम पंचायतों—अमड़ी, जयश्री, भेडिहारी और बहुआर खुर्द—में भी इसी प्रकार के आरोप सामने आए। ग्राम प्रधानों ने अपने बयानों में कहा कि रेनू सिंह द्वारा 2 प्रतिशत तक कमीशन मांगा जाता था और मना करने पर गलत ऑडिट रिपोर्ट देकर रिकवरी की धमकी दी जाती थी।
जांच में यह भी पाया गया कि सोशल ऑडिट टीम से खाली ड्राफ्ट रिपोर्ट पर पहले हस्ताक्षर कराए जाते थे और बाद में उसमें मनमाने निष्कर्ष भरे जाते थे। यह प्रक्रिया पूरी तरह से नियमों के विरुद्ध पाई गई।
सबसे गंभीर तथ्य यह सामने आया कि रेनू सिंह ने जांच समिति के गठन से पहले ही अपने पक्ष में चार ई-स्टांप शपथ पत्र तैयार करा लिए थे, जिनकी तिथि और समय लगभग एक ही था। इससे यह स्पष्ट हुआ कि जांच को प्रभावित करने की कोशिश की गई थी।
इन सभी साक्ष्यों और बयानों के आधार पर जांच समिति ने निष्कर्ष निकाला कि रेनू सिंह के खिलाफ लगाए गए आरोप सत्य और प्रमाणित हैं।

इसी के क्रम में सोशल ऑडिट निदेशालय, उत्तर प्रदेश द्वारा 1 अप्रैल 2026 को जारी आदेश में रेनू सिंह को संविदा विस्तार से बाहर रखते हुए सोशल ऑडिट कार्य से विरत कर दिया गया है, जबकि अन्य समस्त कोऑर्डिनेटरों की सेवा अवधि एक वर्ष के लिए बढ़ा दी गई है।
यह मामला न केवल सोशल ऑडिट प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि यदि समय रहते जांच न हो, तो किस प्रकार सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार पनप सकता है। प्रशासन की इस कार्रवाई को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है।