महराजगंज। जिले में मनरेगा योजना के तहत करोड़ों रुपये के कथित भ्रष्टाचार की जांच अब और गहराई तक जाती दिख रही है। लोकायुक्त उ.प्र. की ओर से मांगे गए प्रतिउत्तर में शिकायतकर्ता ने विस्तृत शपथपत्र के साथ यह आरोप लगाया है कि जिले के कई वरिष्ठ अधिकारी न सिर्फ भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने में शामिल रहे, बल्कि कुछ ने मनरेगा घोटाले के प्रमुख आरोपियों को संरक्षण भी दिया। इसी क्रम में डीसी मनरेगा गौरवेन्द्र सिंह, जिला विकास अधिकारी भोलानाथ, कई पूर्व डीएम और सीडीओ भी अब जांच के घेरे में पहुंचते दिखाई दे रहे हैं।

लोकायुक्त कार्यालय के पत्रांक संख्या-1336-2023/42/8868 दिनांक 16 अक्टूबर, 2025 के संदर्भ में आयुक्त गोरखपुर मंडल द्वारा भेजी गई आख्या पर शिकायतकर्ता ने अपना प्रतिउत्तर पेश किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुनबे की तरह प्रशासनिक अधिकारियों ने पाँच वर्षों तक भ्रष्टाचार की शिकायतों को दबाया और फर्जी भुगतान कराए गए कार्यों को सही ठहराने की कोशिश की।
त्रिस्तरीय जांच में कई कार्य फर्जी पाए जाने के बावजूद कार्रवाई नहीं
शिकायतकर्ता ने अपने प्रतिउत्तर में कहा है कि आयुक्त, गोरखपुर मंडल द्वारा गठित त्रिस्तरीय समिति ने महराजगंज जिले के कई विकास खण्डों में हुए मनरेगा कार्यों को मौके पर फर्जी पाया।
जोगिया ग्राम पंचायत का मामला – लाखों का भुगतान, जमीन पर एक ईंट भी नहीं
त्रिस्तरीय जांच में जोगिया पंचायत में दो प्रमुख कार्य—
पंचायत भवन बाउंड्रीवाल (₹4,84,022)
टैक्सी स्टैंड पुल से मुन्ना पांडेय के खेत तक नाला (₹3,88,332)
को मौके पर शून्य कार्य पाया गया। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इन कार्यों का शिलान्यास तत्कालीन जिलाधिकारी डा. उज्ज्वल कुमार द्वारा किया गया, और ग्राम प्रधान प्रतिनिधि के राजनीतिक प्रभाव में फर्जी भुगतान कराया गया।
इसके बावजूद गौरवेन्द्र सिंह (उपायुक्त श्रम व रोजगार) ने अगस्त 2025 में केवल नोटिस जारी कर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की, जबकि प्रमुख दोषियों– ग्राम प्रधान, तकनीकी सहायक, रोजगार सेवक– पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
घुघली ब्लॉक में 2018–19 की करोड़ों की अनियमितता—अधिकारियों ने खुद को बचाने को संविदाकर्मियों पर मुकदमा लिखा
शिकायतकर्ता का आरोप है कि घुघली ब्लॉक की ग्राम पंचायतों—
बरगदवा माधोपुर
भुवनी
अमोड़ा
में 2018–19 में करोड़ों का भुगतान सिर्फ डोंगल के माध्यम से कर दिया गया। तत्कालीन खण्ड विकास अधिकारी प्रवीण कुमार शुक्ला और एकाउंटेंट पर भुगतान का आरोप लगा।
जब शिकायत दो वर्ष बाद हुई, तब खुद को बचाने के लिए प्रवीण शुक्ला ने अपनी ही अध्यक्षता में जांच कमेटी गठित कर ली और संविदा कर्मचारियों पर मुकदमा दर्ज कराया।
शिकायतकर्ता ने इसे “प्रशासनिक शक्ति का दुरुपयोग” बताते हुए कहा कि तत्कालीन डीएम अमरनाथ उपाध्याय, सीडीओ पवन अग्रवाल और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने अपने स्तर पर फर्जी भुगतान को मंजूरी दी थी, इसीलिए उन्होंने जिम्मेदारी छोटा कर्मचारियों पर डाल दी।
—
परतावल- ब्लॉक: सौरहा पोखरी खुदाई में ₹38 लाख का भुगतान, पर जमीन खाली
विस्तृत प्रतिउत्तर में शिकायतकर्ता ने बताया कि परतावल ब्लॉक में ग्राम पंचायत में सौरहा पोखरी खुदाई के नाम पर 38 लाख रुपये का भुगतान किया गया, लेकिन जांच में पाया गया कि पोखरी की खुदाई कागजों में हुई जमीन पर पोखरी ही नहीं है। भुगतान तत्कालीन प्रभारी खण्ड विकास अधिकारी रामकरण पाल और एकाउंटेंट द्वारा किया गया था।
शिकायतकर्ता का आरोप और गंभीर तब हो जाता है जब वह कहते हैं कि—
> “प्रार्थी द्वारा उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल होने के बाद, खुद को बचाने हेतु चार वर्षों बाद केवल एक ठेकेदार पर एफआईआर दर्ज कराकर मामले को मोड़ने की कोशिश की गई।”
चेहरी ग्राम पंचायत: ₹1.02 करोड़ खर्च का दावा, धरातल पर कुछ नहीं
सदर ब्लॉक के चेहरी ग्राम पंचायत में वित्तीय वर्ष 2022–23 में शासकीय अभिलेखों में ₹1,02,42,402 खर्च दिखाया गया है। यह भुगतान स्कूल, पंचायत भवन, आंगनबाड़ी केंद्र आदि के नाम पर दर्ज है।
परंतु पूर्व जिला पंचायत राज अधिकारी यासिर अब्बास की रिपोर्ट में इन कार्यों में गंभीर अनियमितता की पुष्टि हुई। ग्राम विकास अधिकारी राजेश कुमार सिंह उर्फ राजू और खण्ड विकास अधिकारी पर कार्यवाही की संस्तुति की गई है।
लोकायुक्त जांच की दिशा पर सवाल—भ्रामक रिपोर्ट भेजने का आरोप
शिकायतकर्ता ने वर्तमान डीसी मनरेगा गौरवेन्द्र सिंह पर भी बड़ा आरोप लगाया है। उनका कहना है कि—
दोषियों को नोटिस जारी करने के बाद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
लोकायुक्त, आयुक्त गोरखपुर और जिलाधिकारी को “भ्रामक रिपोर्ट” भेजी गई।
मामला अब भी राजनीतिक संरक्षण के चलते लंबित है।
शिकायतकर्ता ने यह भी उल्लेख किया कि जिला विकास अधिकारी भोलानाथ द्वारा ग्राम पंचायत सचिव को तो तत्काल निलंबित कर दिया गया, लेकिन वास्तविक भुगतान कराने वाले बड़े अधिकारी अब भी कार्रवाई से बाहर हैं।
उच्च स्तरीय जांच की मांग
प्रतिउत्तर के अंत में शिकायतकर्ता ने लोकायुक्त से गुहार लगाई है कि—
> “जब फर्जी भुगतान की पुष्टि त्रिस्तरीय जांच में हो चुकी है, तो उसके बाद भी कार्रवाई न होना जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह है। इसलिए इस पूरे प्रकरण की जांच किसी निष्पक्ष उच्च स्तरीय एजेंसी को सौंपी जाए।”
यह मामला अब न सिर्फ मनरेगा घोटाले की गहराई बताता है, बल्कि यह भी उजागर करता है कि जिला स्तर के भ्रष्टाचार में कैसे बड़े अधिकारी भी आरोपों के घेरे में आते जा रहे हैं। लोकायुक्त उ.प्र. द्वारा आगे की कार्रवाई क्या होती है, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।