महराजगंज। जनपद महराजगंज के सिसवा विकासखंड में वित्तीय वर्ष 2020-21, 2021-22 तथा 2022-23 के दौरान मनरेगा योजना अंतर्गत कराए गए विकास कार्यों में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं के आरोप एक बार फिर गंभीर विवाद का विषय बन गए हैं। समाजसेवी/पत्रकार मनोज कुमार तिवारी द्वारा मुख्यमंत्री, ग्राम्य विकास विभाग, संयुक्त विकास आयुक्त, और जिला प्रशासन को प्रेषित विस्तृत शिकायत में कुल 12 प्रमुख बिंदुओं पर भ्रष्टाचार, अभिलेखों की हेराफेरी, कागजी कार्यवाही दिखाने, निम्न गुणवत्ता की सामग्रियों के उपयोग तथा फर्जी जाँच रिपोर्ट लगाने के गंभीर आरोप लगाए गए थे।
लेकिन जिला प्रशासन द्वारा लोकायुक्त को भेजी गई जाँच रिपोर्ट में इन गंभीर बिंदुओं पर अपेक्षित जाँच न होने से पूरा प्रकरण और अधिक संदेहास्पद हो गया है।

शिकायत में उठाए गए 12 गंभीर सवाल अब भी अनुत्तरित
शिकायत में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि तीन वित्तीय वर्षों में मनरेगा के अंतर्गत—
प्रत्येक वर्क आईडी का प्राक्कलन, माप पुस्तिका (MB), स्टेटमेंट,
उपयोग की गई सामग्री का बिल,
ईंट/इंटरलॉकिंग ईंटों की लैब जाँच,
तकनीकी व वित्तीय स्वीकृति,
टेंडर की प्रक्रिया,
श्रमिकों की वास्तविक उपस्थिति,
GST व TDS की कटौती व जमा,
तथा कथित रूप से ब्लाक प्रमुख प्रतिनिधि धीरेन्द्र प्रताप सिंह उर्फ धिरू सिंह के परिजनों/सहयोगियों की फर्मों से सामग्री आपूर्ति
जैसे बिंदुओं की जाँच आवश्यक थी।
परंतु जिला प्रशासन की ओर से जो आख्या लोकायुक्त को भेजी गई, उसमें इन 12 में से किसी भी बिंदुओं पर कोई भी तथ्यात्मक या अभिलेखीय परीक्षण नहीं किया गया, बल्कि केवल चुने हुए कुछ कार्यों का स्थलीय निरीक्षण कराकर मामला निपटा दिया गया।
लोकायुक्त ने मांगा विस्तृत, तथ्ययुक्त पक्ष — 23 दिसम्बर तक जवाब प्रस्तुत करने का निर्देश
माननीय उप लोकायुक्त, उत्तर प्रदेश ने 12 नवम्बर 2025 को जारी अपने पत्र (संख्या 1282-2025/09/9936) में शिकायतकर्ता से कहा है कि—
> “जिलाधिकारी महराजगंज द्वारा भेजी गई रिपोर्ट पर अपना तार्किक प्रतिवेदन व अभिलेखीय साक्ष्य 23-12-2025 के पूर्व उपलब्ध कराया जाए।”
यह स्पष्ट करता है कि लोकायुक्त भी जिला प्रशासन की आख्या को पर्याप्त नहीं मान रहे और परिवादी से विस्तृत तथ्य प्रस्तुत करने को कहा गया है।
जिला प्रशासन की जाँच पर कई सवाल
जिलाधिकारी महराजगंज द्वारा लोकायुक्त को भेजी गई आख्या में उल्लेख है कि—
शिकायत आईजीआरएस पर तत्कालीन जिलाधिकारी तक पहुँची ही नहीं,
ऑपरेटर द्वारा “त्रुटिवश” गलत रिपोर्ट अपलोड कर दी गई,
8 सदस्यीय समिति ने मौके पर जाकर कुछ कार्यों के फोटो व बयान इकट्ठा किए,
और यह कहा गया कि कार्य “कागजी नहीं पाए गए”।
लेकिन यहाँ कुछ गम्भीर विसंगतियाँ उभरती हैं—
1. 12 बिंदुओं पर अभिलेखीय जाँच क्यों नहीं हुई?
स्थलीय जाँच मात्र से प्राक्कलन, स्टॉक रजिस्टर, बिल, गुणवत्ता परीक्षण, स्वीकृति फाइल, GST-TDS रिकॉर्ड की जाँच संभव ही नहीं।
2. समिति द्वारा कितने प्रतिशत वर्क आईडी की जाँच की गई?
सिसवा ब्लॉक में कुल 120 से अधिक आईडी थीं, पर जाँच केवल चुनिंदा आईडी तक सीमित रही।
3. गुणवत्ता परीक्षण (लैब टेस्ट) की रिपोर्ट क्यों नहीं लगाई गई?
शिकायत में यह बिंदु सबसे महत्वपूर्ण था।
4. 2020-21 में 21 आईडी बंद कैसे और क्यों हुईं — इसकी जाँच कहाँ है?
5. फर्मों की जाँच क्यों नहीं की गई जिन पर सामग्री सप्लाई का आरोप था?
6. ऑपरेटर द्वारा “गलत रिपोर्ट अपलोड” करना साधारण त्रुटि या सोची-समझी कार्रवाई?
जाँच में इस बिंदु की स्वतंत्र समीक्षा नहीं की गई।
शिकायतकर्ता से साक्ष्य मांगे गए, पर जाँच रिपोर्ट स्वयं अपूर्ण
जाँच अधिकारी ने शिकायतकर्ता को बुलाया और उनसे साक्ष्य मांगे, जबकि—
पूरे प्रकरण की जिम्मेदारी प्रशासन पर थी,
अभिलेख ब्लॉक कार्यालय में मौजूद थे,
और 12 बिंदुओं की जाँच प्रशासन को करनी थी।
यह सवाल उठता है कि जब शिकायत बिंदुओं से जुड़े आधारभूत अभिलेख प्रशासन के पास ही उपलब्ध थे, तब शिकायतकर्ता से साक्ष्य की क्या आवश्यकता थी?
स्थानीय ग्रामीणों के बयान और फोटो—क्या ये पर्याप्त हैं?
8 सदस्यीय समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में फोटो और ग्रामीणों के बयान शामिल किए गए, लेकिन—
मौके की स्थिति समय के साथ बदली जा सकती है,
ग्राम पंचायतों की सड़कें व खड़ंजे अक्सर दोबारा मरम्मत होते रहते हैं,
इसलिए स्थलीय निरीक्षण अपने आप में अंतिम सत्य नहीं होता।
मनरेगा की गाइडलाइन कहती है कि किसी भी कार्य का वास्तविक सत्यापन प्राक्कलन, मस्टर रोल, एमबी, बिल-वाउचर, सामग्री परीक्षण और भुगतान अभिलेख आधारित होना चाहिए।
जिला प्रशासन की रिपोर्ट इस मानक पर खरी नहीं उतरती।
क्या मामले को दबाने की कोशिश?
प्रशासनिक आख्या में लगातार यह उल्लेख मिलता है कि—
शिकायत निराधार है,
कार्य मौके पर पाए गए,
गलत अपलोड केवल एक त्रुटि थी।
लेकिन इतने व्यापक आरोपों के बावजूद—
न कोई तकनीकी ऑडिट,
न कोई वित्तीय ऑडिट,
न कोई लैब टेस्ट,
न किसी फर्म की जांच,
न कोई टेंडर/निविदा रिकॉर्ड की जांच
कराई गई।
ऐसे में यह आशंका बलवती होती है कि जांच केवल औपचारिकता पूरी करने हेतु की गई है।
लोकायुक्त अब करेगा विस्तृत परीक्षण
लोकायुक्त द्वारा परिवादी से विस्तृत जवाब मांगे जाने के बाद प्रकरण नए मोड़ पर पहुंच गया है।
अब यह स्पष्ट है कि—
मामले को इतने आसानी से बंद नहीं किया जा सकेगा,
जिला प्रशासन की रिपोर्ट को अंतिम नहीं माना गया है,
और लोकायुक्त की निगरानी में एक व्यापक सत्यापन की आवश्यकता बनेगी।
सिसवा ब्लॉक के मनरेगा कार्यों में तीन वर्षों के दौरान करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन इन कार्यों की जाँच में—
आधी-अधूरी समीक्षा,
गलत रिपोर्ट अपलोड करने की स्वीकारोक्ति,
और अभिलेखीय जाँच न करने की कमजोरी
स्पष्ट रूप से दिखती है।
परिवादी द्वारा उठाए गए 12 गंभीर बिंदुओं को यदि सही रूप से नहीं परखा गया तो मामला न्यायालय और उच्चस्तरीय जांच तक भी जा सकता है।
अब निगाहें 23 दिसम्बर 2025 पर टिकी हैं—
जिस तारीख तक लोकायुक्त ने परिवादी से विस्तृत तथ्य प्रस्तुत करने को कहा है।
इस संवेदनशील प्रकरण का अंतिम सत्य लोकायुक्त की विस्तृत जांच के बाद ही सामने आएगा।