जनपद महाराजगंज में उत्तर प्रदेश कोआपरेटिव से जुड़े कथित बड़े धन खरीद घोटाले और गेहूं खरीद घोटाले की जांच प्रक्रिया एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। वर्ष 2017 से 2024 तक हुए इन मामलों की विस्तृत और निष्पक्ष जांच की मांग लंबे समय से की जा रही थी। इसी क्रम में मंडल आयुक्त, गोरखपुर मंडल द्वारा एक त्रिसदस्यीय जांच समिति का गठन किया गया, जिसमें महाराजगंज के मुख्य विकास अधिकारी, अपर जिलाधिकारी तथा वरिष्ठ कोषाधिकारी को नामित किया गया।

मुख्य विकास अधिकारी, महाराजगंज द्वारा 20 दिसंबर 2025 को जारी पत्र के माध्यम से शिकायतकर्ता श्री मनोज कुमार तिवारी को 26 दिसंबर 2025 को अपने पक्ष एवं संबंधित अभिलेखों सहित उपस्थित होने का निर्देश दिया गया। यह पत्र उन्हें 25 दिसंबर 2025 को प्राप्त हुआ, जिससे समय-सीमा और तैयारी को लेकर भी प्रश्न खड़े हो रहे हैं।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि जिन अभिलेखों के आधार पर जांच होनी है, वही अभिलेख बीते लगभग दो वर्षों से सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत मांगे जाने के बावजूद उपलब्ध नहीं कराए गए। आरोप है कि जिला विपणन अधिकारी एवं जिला सूचना अधिकारी, महाराजगंज द्वारा बार-बार आवेदन देने के बाद भी गेहूं खरीद, भुगतान, परिवहन तथा भंडारण से संबंधित महत्वपूर्ण रिकॉर्ड नहीं दिया गया। ऐसे में यह आशंका गहराती जा रही है कि जांच अधूरी जानकारी के आधार पर औपचारिकता बनकर न रह जाए।
शिकायतकर्ता का कहना है कि यह घोटाला केवल महाराजगंज तक सीमित नहीं है, बल्कि गोरखपुर, देवरिया और कुशीनगर जनपदों तक फैला हुआ है। ऐसे में केवल एक जनपद के अधिकारियों को जांच समिति में शामिल करना निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। मांग की जा रही है कि मंडल या राज्य स्तर के स्वतंत्र अधिकारियों को शामिल कर व्यापक जांच कराई जाए, ताकि वर्षों से चले आ रहे कथित भ्रष्टाचार का सच सामने आ सके।
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह जांच वास्तव में निष्पक्ष, पारदर्शी और दस्तावेज़-आधारित होगी या फिर इसे भी अन्य मामलों की तरह औपचारिकता निभाकर समाप्त कर दिया जाएगा। यदि समय रहते सभी संबंधित अभिलेख सार्वजनिक नहीं किए गए और जांच का दायरा सीमित रखा गया, तो यह प्रक्रिया भी जनता के विश्वास को कमजोर करने वाली साबित हो सकती है।