रिपोर्ट – मनोज कुमार तिवारी
महराजगंज।
उत्तर प्रदेश के महराजगंज जनपद में मानसिक रूप से बाधित एक महिला की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने प्रशासनिक संवेदनशीलता, पुलिस की भूमिका और सामाजिक सुरक्षा तंत्र की वास्तविकता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। यह मामला केवल एक मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में आज भी ज़मीनी स्तर पर तंत्र कितना असहाय और उदासीन बना हुआ है।
इस गंभीर घटना को लेकर बॉर्डर लॉयर्स ट्रस्ट के को-फाउंडर एवं अधिवक्ता विनय कुमार पांडे द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC), राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW), उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, पुलिस महानिदेशक (DGP), जिलाधिकारी एवं पुलिस अधीक्षक महाराजगंज सहित अन्य संबंधित प्राधिकरणों को ईमेल के माध्यम से औपचारिक शिकायत भेजी गई है। शिकायत में पूरे प्रकरण पर तत्काल संज्ञान लेते हुए निष्पक्ष जांच और दोषियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की मांग की गई है।

शिकायत में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि मृत महिला की मानसिक स्थिति स्पष्ट होने के बावजूद उसे समय पर न तो चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराई गई और न ही किसी प्रकार का संरक्षण प्रदान किया गया। यह स्थिति Mental Healthcare Act, 2017, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) तथा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का सीधा उल्लंघन मानी जा रही है।
शिकायतकर्ता के अनुसार, पुलिस और प्रशासन की यह जिम्मेदारी थी कि मानसिक रूप से असहाय महिला को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया जाता, चिकित्सकीय परीक्षण कराया जाता और आवश्यकता पड़ने पर शेल्टर होम या मानसिक स्वास्थ्य संस्थान में भेजा जाता। लेकिन जमीनी हकीकत यह रही कि महिला को उसके हाल पर छोड़ दिया गया, जिसका परिणाम उसकी मौत के रूप में सामने आया।
इस प्रकरण ने यह भी उजागर किया है कि जनपद स्तर पर मानसिक रूप से विचलित, बेघर और असहाय महिलाओं व पुरुषों के लिए कोई ठोस रिस्क्यू मैकेनिज़्म, त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली या अस्थायी शेल्टर व्यवस्था मौजूद नहीं है। यह प्रशासनिक शून्यता भविष्य में भी ऐसे हादसों को न्योता दे सकती है।
बॉर्डर लॉयर्स ट्रस्ट की ओर से यह मांग की गई है कि पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए, जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका तय की जाए और उनके विरुद्ध विधिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही, राज्य स्तर पर ऐसे स्पष्ट दिशानिर्देश तैयार किए जाएं, जिनके तहत मानसिक रूप से असहाय नागरिकों को तुरंत सुरक्षा, इलाज और पुनर्वास मिल सके।
यह घटना केवल एक महिला की मौत नहीं, बल्कि राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी, महिला सुरक्षा, स्वास्थ्य अधिकार और मानव गरिमा से जुड़ा प्रश्न है। समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक मानवीय सुरक्षा पहुंचाना सरकार और प्रशासन का कर्तव्य है। यदि ऐसे मामलों में भी तंत्र निष्क्रिय रहता है, तो यह लोकतंत्र और कानून के शासन पर गहरा आघात है।
अब देखना यह है कि मानवाधिकार आयोग और शासन-प्रशासन इस मामले में कितनी गंभीरता दिखाते हैं और क्या इस दर्दनाक घटना से कोई ठोस सुधारात्मक कदम उठाए जाते हैं या नहीं।