नई दिल्ली/प्रयागराज।
मनोज कुमार तिवारी- संपादक पर्दा फाश न्यूज 24×7
देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था और धार्मिक-सामाजिक विमर्श इन दिनों दो बड़े मुद्दों को लेकर तीखी बहस के केंद्र में है। एक ओर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए Promotion of Equality in Higher Education Regulation–2026 को लेकर छात्रों और सामाजिक समूहों में असमंजस और आक्रोश है, वहीं दूसरी ओर माघ मेले के दौरान ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ हुई कथित अभद्रता ने सनातन समाज को झकझोर दिया है। इन दोनों घटनाओं को जोड़कर देखा जा रहा है और सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह केवल संयोग है या किसी व्यापक नीति का संकेत?
UGC का नया रेगुलेशन: समानता या नया विवाद?
UGC ने 13 जनवरी 2026 से Promotion of Equality in Higher Education Regulation–2026 को देशभर की उच्च शिक्षण संस्थाओं में लागू कर दिया है। आयोग का दावा है कि इसका उद्देश्य विश्वविद्यालय परिसरों में भेदभाव रोकना, समावेशी वातावरण बनाना और वंचित वर्गों के छात्रों को न्यायपूर्ण संरक्षण देना है।
हालांकि, इस रेगुलेशन को लेकर एक वर्ग विशेष में गहरी आशंका देखी जा रही है। आलोचकों का कहना है कि इस नियम के तहत अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों को कथित रूप से “जन्म से पीड़ित” मानने की धारणा बनती है, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों पर “जन्मजात आरोपी” जैसा दबाव उत्पन्न हो सकता है।
रेगुलेशन में “प्रतिकूल व्यवहार”, “मानवीय गरिमा को ठेस” जैसे शब्दों की व्यापक व्याख्या की गई है। आलोचकों का तर्क है कि इन शब्दों की स्पष्ट परिभाषा न होने से इनके दुरुपयोग की आशंका बढ़ जाती है। विश्वविद्यालयों में प्रस्तावित Equity Squads को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं, जिनका काम कथित भेदभाव की निगरानी करना होगा।
SC-ST एक्ट से तुलना और झूठी शिकायतों का मुद्दा
इस नए रेगुलेशन की तुलना कुछ लोग SC-ST अत्याचार निवारण अधिनियम से कर रहे हैं। उनका कहना है कि जहां SC-ST एक्ट में OBC शामिल नहीं थे, वहीं इस रेगुलेशन में OBC को भी दायरे में लाया गया है। साथ ही, 2012 के कुछ प्रावधानों में झूठी शिकायत पर दंड की बात थी, जबकि नए नियमों में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं दिखता। यही कारण है कि छात्रों और शिक्षकों का एक वर्ग इसे “एकतरफा” मान रहा है।
कई शिक्षाविदों का कहना है कि यदि प्रोफेसर द्वारा कम अंक देने, अकादमिक बहस या सामान्य व्यवहार को भी जातिगत भेदभाव की श्रेणी में डाल दिया गया, तो शिक्षा का मूल उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।
शंकराचार्य विवाद और सनातन समाज की प्रतिक्रिया
इसी बीच माघ मेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ पुलिस द्वारा की गई कथित अभद्रता ने धार्मिक हलकों में नाराजगी पैदा कर दी है। इस घटना के बाद गोवर्धन मठ पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने खुलकर समर्थन देते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अपना “लाडला” बताया और उनके निर्णयों को शास्त्रसम्मत एवं न्यायोचित करार दिया।
पुरी शंकराचार्य का यह बयान कि “शंकराचार्य के निर्णयों को सर्वोच्च न्यायालय तक ने मान्यता दी है”, इस समर्थन को और मजबूत करता है। सनातन परंपरा से जुड़े संगठनों का कहना है कि जगतगुरु शंकराचार्य केवल एक संत नहीं, बल्कि वेदों और धर्म परंपरा के संरक्षक हैं, जिनके साथ किसी भी प्रकार का अपमान पूरे समाज की आस्था को चोट पहुंचाता है।
सत्ता बनाम सनातन की बहस
इन घटनाओं के बाद राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश सरकार और विशेष रूप से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रशासन ने इस मामले को केवल एक प्रशासनिक या कानून-व्यवस्था का मुद्दा समझा, जबकि धार्मिक समाज इसे आस्था से जुड़ा विषय मानता है।
आलोचक यह भी सवाल उठा रहे हैं कि कथावाचकों और अन्य स्वयंभू धर्माचार्यों के प्रति सत्ता का रवैया अलग क्यों दिखता है, जबकि शंकराचार्य जैसे सर्वोच्च धर्मपद पर आसीन संतों के मामले में सख्ती नजर आती है। इसे “दोहरा मापदंड” बताया जा रहा है।
राजनीतिक संकेत और आगे की राह
बीजेपी के भीतर और बाहर के जानकारों का कहना है कि यदि सनातन परंपरा से जुड़े बड़े वर्ग की नाराजगी बढ़ती है, तो इसका राजनीतिक असर भी पड़ सकता है। यह वर्ग अब यह प्रश्न पूछ रहा है कि क्या सत्ता का अहंकार आस्था से बड़ा हो गया है?
वहीं, सरकार समर्थक पक्ष का तर्क है कि UGC के नियम सामाजिक न्याय और समानता की दिशा में एक कदम हैं और शंकराचार्य से जुड़ी घटना को अनावश्यक रूप से राजनीतिक रंग दिया जा रहा है।
UGC के नए रेगुलेशन और शंकराचार्य विवाद ने देश में शिक्षा, सामाजिक न्याय, धर्म और सत्ता के रिश्ते पर नई बहस छेड़ दी है। एक ओर समानता और समावेशन की बात है, तो दूसरी ओर दुरुपयोग और आस्था के अपमान की आशंका। आने वाले समय में अदालतों, सरकार और समाज को यह तय करना होगा कि संतुलन कैसे बनाया जाए—ताकि न तो सामाजिक न्याय कमजोर पड़े और न ही शिक्षा व धार्मिक आस्था पर अविश्वास की छाया गहराए।